‘‘यदि प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी फुटबाल के विकास के लिए कर्तव्यबद्ध हैं तो कम से कम अंबेडकर स्टेडियम फुटबाल को दे दें,’’ पूर्व ओलंपियन सैयद शाहिद हकीम

एक समय था जब फुटबाल में भारत एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक लाया करता था और ओलंपिक में पदक के लिए प्रतिस्पर्धा रहती थी। उस स्तर से भारतीय फुटबाल का स्तर लुढ़कते हुए इतना नीचे चला गया है कि अब और अधिक नीचे जाना संभव नहीं। भारत में होने जा रहे फीफा अंडर17 फुटबाल विश्व कप से कुछ महीने पूर्व प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने फुटबाल में भारत की खोई महिमा वापिस लाने के लिए कुछ घोषणाएं की हैं। उन्होंने फुटबाल के इर्दगिर्द एक बड़ा आंदोलन चलाने और हर बच्चे को फुटबाल खेलने का अवसर देने की आवश्यकता की बात की है। उन्होंने मिशन इलेवन मिलियन को एक आंदोलन के रूप में घोषित किया है जो देश के कम से कम 11 मिलियन छात्र और छात्राओं को फुटबाल जैसे खूबसूरत खेल से जोड़ने की कोशिश करेगा। आरएनआई  ने पूर्व ओलंपियन, अंतरराष्ट्रीय फीफा रेफरी और कोच सैयद शाहिद हकीम से बात करके जानने की चेष्टा की कि भारतीय फुटबाल के पतन के क्या कारण हैं और देश में इस खेल को पुनर्जीवित करने के क्या मार्ग हैं? पेश हैं सैयद शाहिद हकीम की खुलेदिल बातचीत के अंशः

Syed Shahid Hakim, Former Olympian, FIFA Referee and Coach & presently Chief Project Director, SAI (Sports Authority of India)

 

आरएनआई: आप एक प्रख्यात फुटबालर, रेफरी और कोच रहे हैं। आप अपने कॅरियर और उपलब्धियों को कैसे देखते हैं?

सैयद शाहिद हकीमः फुटबाल मेरा पारिवारिक खेल है। मेरे पिता, चाचा और पूरा परिवार फुटबाल खेलता था और यही इस खेल में मेरी दिलचस्पी का कारण बना। 1946 में, जब मैं छोटा था, मेरे चचेरे भाई मुझे मैच दिखाने ले जाया करते थे। उस समय आर्मी की टीमें टैंक्स और रायल एयरफोर्स आदि खेलती थीं और मैं उनके मैच देखता था। मैं उस छोटी उम्र से फुटबाल खेलता थाः घर में, सड़कों पर और स्कूल में। जहां मेरे पिता की इच्छा थी कि मैं इंजीनियर बनूं, मैं एक सेनाकर्मी और फुटबालर बनने के लिए अधिक इच्छुक था। कालेज में अपने पहले साल में मैं फुटबाल नहीं खेल सका। परन्तु दूसरे वर्ष मुझे एक मैच खेलना पड़ा। अपने कालेज का मैं केवल एक ही खिलाड़ी था और टीम के दूसरे खिलाड़ी बाहर के थे और हम मैच जीत गये। श्री वेंकटचेलम जो कालेज के फिज़िकल डायरेक्टर थे ने मुझे अगले दिन बुलाकर मैंसफील्ड नाम का फुटबाल बूट भेंट किया और मुझे फुटबाल की प्रैक्टिस करने को कहा। उन्होंने मुझसे कहा कि अगले वर्ष मैं कालेज टीम का कप्तान रहूंगा। हालांकि मेरे परिवार ने मुझे फुटबाल खेलने के लिए प्रेरित किया और मेरे पिता एक महान कोच थे परन्तु फुटबाल में मुझे गंभीरता से लाने वाले श्री वेंकटचेलम साहब थे। फुटबाल एक नशे की तरह है। जब एक बार नशा छा जाता है तो इसके बिना रहना नामुमकिन हो जाता है। फुटबाल के कारण मैं ने इंजीनियरिंग छोड़ दी और एयरफोर्स में भर्ती हो गया। यह मेरे जीवन का सबसे अच्छा निर्णय था क्योंकि सेना में होने के कारण मेरा व्यक्तिगत विकास बहुत अधिक हुआ।

जब मैं पहली बार प्रदेश स्तर पर खेला तो हमारी टीम भारतीय चैंपियन बन गई। फिर प्री-ओलंपिक के परीक्षण के लिए मेरा नाम आ गया। परीक्षण में चुन लिया गया और फिर इंडोनेशिया चला गया। वहां पर भी जीत दर्ज की। फिर वहां से रोम चला गया। परन्तु वापिस आने के बाद मैं एयरफोर्स में भर्ती हो गया जिसके कारण मुझे दो वर्ष फुटबाल छोड़ना पड़ा। एक वर्ष तो प्रशिक्षण के कारण 1962 के एशियन गेम्स छुट गए जिसमें हम स्वर्ण पदक जीते। यदि मैं खेल रहा होता तो मेरा चयन शतप्रतिशत होता। फिर भारत-चीन युद्ध आरंभ हो गया। उसके बाद मैं खेलता रहा। मैंने उत्तरी भारत की कप्तानी की। मेरा फुटबाल कॅरियर 1952 से प्रारंभ हुआ जो 1975 में समाप्त हुआ। तक़रीबन 25 साल!

हैदराबाद में, मेरे पिता ने अनिवार्य कर दिया था कि हर ओलंपियन अंतरराष्ट्रीय रेफरी बनेगा। 1970 से रेफरिंग में आ गया और 1989 तक रेफरिंग की। इस दौरान 33 अंतरराष्ट्रीय मैच किए जो आज तक राष्ट्रीय रिकार्ड है। फिर कोचिंग करता रहा। जामिया मिलिया की कोचिंग की। आज मैं साई का चीफ प्रोजेक्ट आफिसर हूं पर फिर भी बच्चों को कोचिंग देने मैदान में उतर जाता हूं। फुटबाल मेरा जुनून है!

मेरे पिता फुटबाल संघ से जुड़े थे; वह उसके सचिव एवं कोच थे। जो कुछ उन्होंने भारतीय फुटबाल को दिया है शायद ही किसी और ने दिया होगा। फुटबाल में हमारा जो योगदान है शायद ही किसी और का होगा। 1952 ओलंपिक में जब हम चैथे स्थान पर आए थे तो मेरे पिता कोच थे, ज़ियाउद्दीन मैनेजर थे, और अज़ीज़, सलाम, लतीफ, रहमान, अहमद हुसैन, नूर, ज़ुलफिक़ार खेले थे। मेरे पिता दो बार एशियन गेम्स में गए, 1951 में और 1960 में, और दोनों बार स्वर्ण पदक लाए। 1956 ओलंपिक में हमारा चैथा स्थान आया। 1960 ओलंपिक में हम 6वें स्थान पर थे; यह निसंदेह महान उपलब्धि थी। यद्यपि हम 1956 ओलंपिक में चैथे स्थान पर आए थे, 1960 ओलंपिक में हमारी उपलब्धियां वास्तव में अभूतपूर्व थींः हंगरी से एक गोल से हारना, फ्रांस से खेल बराबर करना और पेरू से दो गोल से हारनाः मैं नहीं जानता इस प्रदर्शन को दोहराने में फिर कितना समय लगेगा।

 

आरएनआई: इसके पश्चात फुटबाल के पतन के क्या कारण हैं?

सैयद शाहिद हकीमः खेल का व्यावसायीकरण अच्छा है परन्तु हमारे फुटबाल के लिए अच्छा नहीं था। व्यावसायीकरण के कारण खिलाड़ियों और कोच को पैसा मिलता है। ल्योनल मैस्सी भी पैसा लेता है, पर उसका दोगुना वापिस देता है। फैडरर भी पैसा लेता है पर देखिए कहां नीचे जाकर फिर से नंबर एक के क़रीब आ गया है। हमारी बदनसीबी है कि पैसा तो लेते हैं, पर जो वापिस देना होता है वह नहीं देते। रहीम साहब और दूसरे पुराने खिलाड़ियों का खेल के प्रति जो समर्पण था वह खो गया है। खिलाड़ी केवल खेल के प्रति अपनी निष्ठा के कारण खिलाड़ी बनता है, पैसे के कारण नहीं। पुराने समय में हमारे पास ऐसी सुविधाएं नहीं थींः अब रूकने के लिए अच्छे होटल हैं, बेहतरीन खाना मिलता है, किसी चीज़ की कमी नहीं है, बल्कि मैं कैंप में देखता हूं कि इतना मेवा मिलता है कि एक खिलाड़ी खा भी नहीं सकता। समर्पण और निष्ठा की कमी है। जब तक समर्पण और निष्ठा न हो कोई कोच आपको खिलाड़ी नहीं बना सकता, बना सकता है तो आपका दिल। आपका दिल यदि किसी चीज़ में है, अगर आप किसी चीज़ से प्यार करेंगे तो आप आगे आ जाएंगे। कुछ भी करना हो ज़िन्दगी में तो प्यार करो। यदि प्यार हो जाएगा, चाहे पढ़ाई से हो, चाहे खेल से, या गाने बजाने से, तो इंसान आगे निकल जाएगा। साथ साथ आपकी आदतें अच्छी होनी चाहिए। आपको प्यार तो है पर रात को दो बजे तक टीवी देख रहे हैं। आपको प्यार है पर शराब पी रहे हैं। आपको प्यार है परन्तु आप तंबाकू खा रहे हैं। आप जवान हैं तो 4-5 साल खेल लेंगे पर आगे कुछ नहीं होगा। जो 20 साल खेलना था, 4-5 साल में ज़िन्दगी समाप्त हो जाएगी।

एक होता है खिलाड़ी और एक होता है स्पोटस्मैन! खिलाड़ी याद नहीं रहता परन्तु स्पोर्टस्मैन को हमेशा याद रखा जाता है। फैडरर को देख लीजिए, इतना बड़ा खिलाड़ी है पर उसके मुंह पर घमंड का निशान भी नहीं है। जीत गया तो हाथ उठा देगा, हार गया तो हाथ उठाकर चला जाएगा। हमें इस सब से बहुत कुछ सीखना है।

 

आरएनआई: ओलंपिक में चैथा स्थान और एशियन गेम्स में स्वर्ण पदक! क्या निष्ठा और समर्पण के कारण ही यह सब संभव हो पाया?

सैयद शाहिद हकीमः रहीम साहब का निधन 1963 में हुआ। फिर वहां से पतन प्रारंभ हुआ। परन्तु 1970 तक खेल अच्छा रहा। 1970 में बंगलूरू के गुलाम मोईनुद्दीन बादशाह साहब कोच थे तो एशियन गेम्स में कांस्य पदक मिला। हमारा अंतिम अच्छा प्रदर्शन 1982 एशियन गेम्स में हुआ जहां हम क्वार्टर फाईनल में सऊदी अरब से एक गोल से हारे। हम खेल पर हावी थे लेकिन एक ग़ल्ती हो गई जिसके फलस्वरूप हम गोल खा गए। उस समय पी के  बनर्जी और अरूण घोष कोच हुआ करते थे। 1982 एशियन गेम्स के बाद से जो हमारा स्तर गिरा तो मैं समझता हूं भारतीय फुटबाल सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है। अब इसके बाद और नीचे जाना संभव नहीं!

पंडित नेहरू कहा करते थे कि देश के लिए एक तकनीकी व्यक्ति का महत्व सोने और चांदी से बहुत अधिक होता है। भारतीय फुटबाल का सब से बड़ा दुर्भाग्य यह है कि अधिकतर संघों के शिखर पर गैर-तकनीकी लोग बैठे हैं जिन्होंने खेल देखा ही नहीं है, खेलना तो बहुत दूर की बात है। क्या फुटबालरों में पढ़े लिखे लोग नहीं हैं? क्या फुटबालरों में प्रशासनिक व्यक्ति नहीं हैं जो इन्हें लगाया जाता है? अभी यूथ प्रतियोगिता में क्या होने वाला है आप स्वयं देख लेंगे!

 

आरएनआई: 2012 में फीफा ने भारतीय फुटबाल को विकसित करने की घोषणा की थी। पांच वर्ष बीत चुके हैं, हम आज भी वही बातें कर रहे हैं। आखिर भारतीय फुटबाल का विकास कैसे होगा?

सैयद शाहिद हकीमः मैं एक संवेदनशील व्यक्ति हूं! झूठे दावों को करना आसान है; मैं भी कर सकता हूं कि आप मेरे हाथ में कमान देते हैं तो मैं भारत को पांच वर्ष में विश्व चैंपियन बना दूंगा। लेकिन व्यवहारिक रूप से क्या हो रहा है? हमारा स्तर दिन प्रतिदिन गिरता जा रहा है। कारण क्या हैं? हाल ही में गृह सचिव से मुलाक़ात हुई। वह बच्चों के लिए अखिल भारतीय टूर्नामेंट आयोजित करना चाहते थे जो कि अच्छा है। उन्होंने मुझ से पूछा कि फुटबाल के स्तर में गिरावट के कारण क्या हैं? मैं ने कहा कि मैं थोड़े समय में सभी कारणों का ब्योरा नहीं दे सकता परन्तु एक बात जो मैं कह सकता हूं वह यह कि आप भी ज़िम्मेवार हैं। उन्होंने पूछा कि कैसे? मैंने कहा कि पुलिस ने फुटबाल में दिलचस्पी लेना छोड़ दी है। पहले पुलिस की टीमें हुआ करती थींः हैदराबाद पुलिस, कलकत्ता पुलिस, केरल पुलिस, पंजाब पुलिस, बीएसएफ, सीआरपीएफ, आदि। यह बहुत अच्छी टीमें थीं! अब यह टीमें कहां हैं? हर व्यक्ति ने इसी प्रकार मैदान छोड़ दिया।

सब से महत्वपूर्ण बात यह है कि स्कूलों में खेल नहीं रह गए हैं। शिक्षाविद आज खेल के सबसे बड़े दुश्मन हैं। वे एक ढाई वर्ष के बच्चे की परीक्षा लेते हैं। यह उम्र खेलने की है, पढ़ाई की नहीं है। जब मैं ढाई वर्ष का था मुझे पता भी नहीं था कि किताब क्या होती है। स्कूल पांच वर्ष की उम्र तक दाखिला नहीं लेते थे। आज हम इनकी परीक्षा ले रहे हैं। इन शिक्षाविदों ने बच्चे के बचपन को मार डाला है। श्री कपिल सिब्बल ने सेमेस्टर परीक्षाओं को प्रारंभ किया है। कोई खिलाड़ी अंतर-विश्वविद्यालय खेलेगा या सेमेस्टर की परीक्षा देगा?

आज खेलों के लिए कोई प्राथमिकता नहीं है। यदि आप मुझे संसद में बोलने की अनुमति दे तो मैं दो घंटे बिना तैयारी के बोल सकता हूं। नंगा कर दूंगा हर किसी को!

 

Modi ji’s Mission XI Million

आरएनआई: आप संसद का उल्लेख कर रहे हैं। हाल ही में सब सांसदों को एक-एक फुटबाल भेंट की गई है और नरेंद्र मोदी जी ने मिशन इलेवन मिलियन की घोषणा की है जिसके तहत देश के 11 मिलियन बच्चों को फुटबाल से जोड़ा जाएगा। इस पर आप क्या कहते हैं?

सैयद शाहिद हकीमः जहां तक फुटबाल को विकसित करने की बात है, मैं यदि पूरे मौहल्ले को फुटबाल भेंट कर दूं तो क्या इससे फुटबाल का विकास हो पाएगा? सांसदों को फुटबाल देने से क्या होगा? यदि प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी फुटबाल के विकास के लिए कर्तव्यबद्ध हैं तो कम से कम अंबेडकर स्टेडियम फुटबाल को दे दें। आज अंबेडकर स्टेडियम का एक दिन का किराया 5000 रूप्ये है। कौन सी एसोसिएशन दे पाएगी 5000 रूप्ये? बड़े अफसोस की बात है कि दिल्ली भारत की राजधानी है। राजधानी की एसोसिएशन के पास अपने मैदान नहीं है। आप फुटबाल को विकसित करने की बात करते हो। मुझे कुछ नहीं चाहिए! मैं एक ही चीज़ मांगता हूं। हर गांव में एक ज़मीन का टुकड़ा दे दो और हर महीने एक फुटबाल दे दो। महीने भर में एक फुटबाल पर 300 से 500 रूप्ये खर्चा आएगा। हम दो लकड़ियां गाड़ लेंगे और ऊपर डोरी बांध कर गोलपोस्ट तैयार कर लेंगे। 22 बच्चे खेलेंगे। करीब 700 गांव हैं। हर गावं से एक बच्चा निकल कर आएगा तो भारत की टीम बन जाएगी कि नहीं? क्या आप इतना नहीं कर सकते? क्या पंचायत एक फुटबाल नहीं दे सकती?

फुटबाल अथवा बालीबाल की टीम बनाना एथलीट पैदा करने से अधिक जटिल काम है। मैं एथलीट कोच नहीं हूं पर यदि मुझे 25 बच्चे दे दो, मैं उनमें से एक को एथलीट बना दूंगा पर फुटबाल टीम नहीं बना सकता। मुझे 20 बच्चे चाहिए। 20 बच्चों को एकजुट करना आसान कार्य नहीं है। आज तो साल भर शिविर लगते हैं। अनेक अकादमियां हैं। पहले ऐसा कुछ कुछ भी नहीं था। न प्रशिक्षण होता था न शिविर लगते थे और न ही खाना मिलता था। शिविरों को अधिकतम 10 सप्ताह तक आयोजित किया जाता था। रहीम साहब ने 10 सप्ताह में भारत के लिए चमत्कार कर दिया था। परन्तु आज रहीम साहब को कोई नहीं जानता है। उनको कभी कोई सम्मान नहीं दिया गया। अज़ीज़ को कभी कोई सम्मान नहीं मिला। अज़ीज़, नूर, थंगाराज, बलराम, पी के बनर्जी, यह वे खिलाड़ी थे जो दो-दो ओलंपिक खेले, दो से तीन बार एशियन गेम्स खेले। केवल पी के बनर्जी को पद्यम श्री मिला, परन्तु अज़ीज़, नूर, बलराम, थंगाराज, को नहीं मिला। उसके पश्चात जर्नेल सिंह, इंद्र सिंह, हबीब, फ्रैंको, अरूण घोष को कोई सम्मान नहीं मिला। पद्यम श्री तुम ने उस खिलाड़ी को दे दिया जिसके ज़माने में हम एशियन गेम्स के तीसरे राउंड में नहीं पहुंचे। क्या यह इंसाफ है? एक शाहिद हकीम बोलने वाला है, बोलता रहेगा मरने तक, चाहे बात सुनी जाएगी या नहीं सुनी जाएगी।

 

आरएनआई: हम आशा करते हैं कि सरकार आपकी बातों की ओर ध्यान देगी …

सैयद शाहिद हकीमः मुझे बताईए … रहीम साहब, अज़ीज़, नूर, थंगाराज, बलराम, फ्रेंको, अरूण घोष, जर्नेल सिंह, हबीब, इंद्र सिंह, नईम, इन खिलाड़ियों को पुरस्कृत क्यों नहीं किया गया। यह सब एशियन गेम्स में स्वर्ण पदक विजेता हैं। जिन्होंने ओलंपिक में चैथा स्थान प्राप्त किया उनको छोड़ कर आप ने पद्यम श्री एक ऐसे खिलाड़ी को दे दिया जिसके दौर में भारतीय टीम एशियन गेम्स के तीसरे दौर में भी नहीं पहुंची। मोदी जी या कोई और, मुझ को बुला कर बात करें, मैं सामने बात करूंगा। जब सच्ची बात करनी है तो डर किस बात का। गलत बात कह रहा हूं तो मुझे फांसी दे दो!

मैं दूसरे खेल के बारे में नहीं बोलूंगा। हाकी के बारे में मैं क्या बोलूं? परन्तु फुटबाल में मैं बोलूंगा और बोलता रहूंगा। इंसाफ से बताओ! जिस खिलाड़ी के ज़माने में भारतीय टीम एशियन गेम्स के तीसरे दौर में नहीं पहुंची उसको तुम पद्यम श्री देते हो और एशियन गेम्स स्वर्ण पदक विजयता और ओलंपिक में चैथा स्थान प्राप्त करने वाले खिलाड़ियों को वंचित रखते हो? कौन बच्चा इससे प्रेरणा लेगा जब वह देखता है कि मेरे लिए तो इंसाफ ही नहीं है। हकीम साहब बेवकूफ हैं पूरी ज़िन्दगी गुज़ार दी, मैं थोड़े ही बेवकूफ हूं। इतने में करोड़ों कमा लेता!

आरएनआई न्यूज़ ब्यूरो

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