सखी मंडल से समृद्ध होती ग्रामीण महिलाएं

विश्व बैंक के भारत में निदेशक जुनैद कमाल अहमद ने शायद सोचा भी न होगा कि  झारखंड जैसे आदिवासी बहुल राज्य के उनके दौरे पर उन्हें ग्रामीण महिला सशक्तीकरण और स्वयं रोज़गार के ऐसे जीवंत उदाहरण  देखने को मिलेंगे जिसकी उन्हें उम्मीद भी न थी। आखिर कौन सोच  सकता था कि समूचे भारत उपमहाद्वीप में सबसे पिछड़े क्षेत्रों में गिने जाने वाले इलाक़े में काम कर रही रघुबर दास की सरकार जल-जंगल और ज़मीन से जुड़े गरीब और अतिगरीब लोगों को इन्ही संसाधनों से भर पेट खाना मिल सके इसको अपना मिशन बना लेगी। यह श्रय जाता है आजीविका मिशन और झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रोमोशन सोसायटी को। देखिए कुछ जीवंत उदाहरणः

नरेंद्र मोदी के डिजीटल इंडिया प्रोग्राम की तर्ज़ पर झारखंड ने टैबलेट दीदी प्रोग्राम को चलाया है। ग्रामीण इलाकों की जो महिलाएं मोबाईल प्रयोग करना भी नहीं जानती थीं आज वे टैबलेट पर काम कर रही हैं और न केवल उससे आवश्यक जानकारी प्राप्त कर रही हैं बल्कि दूसरी महिलाओं का हिसाब किताब भी रख रहीं हैं और इंटरनेट का प्रयोग भी कर रही हैं। झारखंड में आज 700 से अधिक महिलाएं हैं जो टेबलेट का मतलब दवाई समझती थीं परन्तु अब स्वयं टैबलेट दीदी के रूप में काम कर रही हैं। इससे जो आत्मविश्वास पैदा हो रहा है वह ज़बरदस्त है।

चायबासा की सीमा की दो बेटियां हैं। पति का देहांत हो जाने के पश्चात उनके लिए दो बेटियों के लालनपालन में कठिनाई हो रही थी। ऐसे में वह सेल्फ हैल्प ग्रुप से जुड़ी और आहिस्ता आहिस्ता सीमा न केवल अन्य कई महिलाओं को आजीविका मिशन से जोड़ पाईं बल्कि उनके हालात ऐसे बदल गये कि उनकी अपनी बेटी इंजीनियरिंग कर रही है।

इसी प्रकार झारखंड के बेड़ो प्रखण्ड के पतरा टोली गांव की रहने वाली कनक लता टोप्पो बैंकिंग सखी कारस्पान्डेंट बन गई हैं। आज कनक झारखंड ग्रामीण बैंक की बीसी सखी के रूप में काम कर रही हैं और वित्तिय बैंकिंग सेवाओं को ग्रामीण लोगों तक पहुंचा रही हैं। कनक की आज अपनी पहचान है और वो अपने गांव में बैंक वाली दीदी के नाम से जानी जाती हैं।

नामकुम के डोलाम गांव की प्रफुल्लित एकता का उदाहरण भी उल्लेखनीय है। उनके पति बेरोज़गार तो नहीं थे लेकिन तीन बच्चों वाले परिवार का मुश्किल से पेट भर पाता था। आजीविका कृषक मित्र जो गांव के गरीब परिवारों को खेती की उन्नत तकनीकों से जोड़ना और उन्हें प्रशिक्षित करना सिखाते हैं ने प्रफुल्लित के जीवन में नई प्रफुल्लता का समावेश कर दिया है। प्रफुल्लित तो केवल एक उदाहरण है अनेक ग्रामीण महिलाओं ने स्वरोज़गार के क्षेत्र में कदम रखा और ग़रीबी की दलदल से बाहर निकलीं। जहां पहले खेती और मज़दूरी करके भी इन्हें दो वक्त का खाना नसीब नहीं होता था आज उनमें से कई अपने बच्चों को प्राईवेट स्कूलों में पढ़ा रही हैं।

इसी प्रकार बकरी पालन ने जारा टोली गेतलसूद की रूलुआ देवी की माली हालत सुधार दी है। इसको रोज़गार का ठोस ज़रिया बनाने में पशु सखियां काफी मददगार साबित हो रही हैं। पशु सखियों को खास प्रशिक्षण दिया जाता है जिसके बाद यह मामूली फीस लेकर पशुओं का इलाजकरती हैं। पशु सखी स्वयं एक प्रतिष्ठित रोज़गार बन गया है।

ऐसे ही एक उदाहरण में कोट्टे आजीविका महिला ग्राम संगठन की 4 महिलाओं ने गरीबी को मात देते हुए रांची के नगड़ी प्रखण्ड के स्टेट हाईवे पर आजीविका दीदी कैवे नामक ढाबा खोला है जो पूरे इलाके़ में मशहूर हो चुका है। यह ढाबा सखी मंडल से समृद्ध होती महिलाओं का एक उदाहरण है। ऐसे क़रीब 40 ढाबे झारखंड में जगह जगह खुल चुके हैं जो बढ़िया खाने के लिए प्रख्यात हो चुके हैं। हाल में मुख्य सचिव ने निर्देश पारित किए हैं कि इस कार्य में तेज़ी लाई जाए और समूचे झारखंड में ब्लाक स्तर तक ढाबे खोलने के लिए महिला ग्राम संगठनों को प्रेरित किया जाए।

झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रोमोशन सोसायटी के सीईओ पारितोश उपाध्याय बताते हैं कि ग्रामीण आदिवासी इलाकों में ग़रीबी को कम करने या दूर करने के उद्देश्य से यह सब योजनाएं चलाई गई हैं। यह केवल कुछ उदाहरण नहीं हैं बल्कि समूचे झारखंड में जहां जहां भी इन योजनाओं का कार्यान्वयन हुआ है ग्रामीणवासियों में सामुदायिक संस्थानों को बढ़ावा देते विभिन्न आजीविका अभियानों के माध्यम से इन गरीब परिवारों को लक्षित किया जा रहा है उन्हें तकनीकी शिक्षा और लाभप्रद आजीविका गतिविधियों से जोड़ा जा रहा है और ऐसी मिशन टीमों को क्लस्टर, ब्लाक और ज़िला स्तर पर तैयार किया जा रहा है जो समुदाय के सदस्यों के बीच ज्ञान का प्रसार करने में लगे हैं।

परितोशबताते हैं कि ‘‘हमें लगता है कि गरीबी उन्मूलन का समग्र उद्देश्य इन ग्रामीण महिलाओं को सशक्त बनाने और फिर इन समुदाय संस्थानों के पोषण और मजबूत करने के जरिए ही संभव है ताकि ग्रामीण समुदाय को सशक्त और समृद्ध बनाया जा सके।

सखी मंडल के बारे में जानकारी देते हुए सोसाएटी में प्रोग्राम मैनेजर कुमार विकाश बताते हैं किएक सखी मंडल में दस से पंद्रह गरीब ग्रामीण महिलाओं को जोड़ा जाता है। उनका माइक्रो क्रेडिट प्लान बनता है और इन्हें आर्थिक सहायता के साथ बैंक श्रण दिलाने में मदद दिलाई जाती है। टैबलेट दीदी पशु सखी कृषि मित्र आदि अनेक केडर हैं जिनसे जो आत्म विश्वास पैदा हो रहा है वह ज़बरदस्त है।

सरकार विभिन्न क्षेत्रों में सखी मंडलों की सेवाओं का उपयोग कर रही है जिसमें स्वच्छ भारत मिशन के तहत शौचालय निर्माण भी शामिल है। ग्रामीण विकास विभाग के सह मुख्य सचिव एन एन सिन्हा बताते हैं कि सखी मंडलों की कार्य में दक्षता समर्पण और शक्ति का उपयोग सरकार विभिन्न योजनाओं को लागू करने में ले रही है। इसका एक उदाहरण स्वच्छ भारत मिशन के तहत शौचालय निर्माण है। जब से सखी मंडल इस में शामिल हुए हैं यह कार्यक्रम एक व्यापक सफलता बन गया है। वे खुले शौच मुक्त अभियान ओडीएफ और जागरूकता अभियान के कार्यान्वयन में भी शामिल हैं।

सखी मंडल के कार्य को संक्षेप में चिंहित करते हुए एन एन सिन्हा कहते हैं ग्रामीण लोगों के साथ सीधे सम्पर्क स्थापित करने पंचायती राज संस्थानों और ग्राम सभाओं को मज़बूत करने में भागीदार बनकर सखी मंडल लोक तंत्र की जड़ें मज़बूत करने में बड़ा योगदान दे रहे हैं।

नई तकनीक से झारखंड के आदिवासी इलाकों में धान की पैदावार भी बढ़ी है। खेती के साथ आदिवासी मुर्गियां, बत्तखें बकरियां और सुअर पालने का काम करते रहे हैं। समूह के जरिए अब इन आदतों को रोजगार की शकल दी जा रही है। समूह से कर्ज लेकर शुरू किए गये इस व्यवसाय ने ही इन परिवारों को गरीबी की दलदल से निकाला। पहले खेती और मजदूरी करके भी इन्हें दो वक्त का खाना नसीब नहीं होता था।

महिलाओं के प्रोतसाहन से आत्मविश्वास बढ़ा है। वह अब परंपरागत धंधों से बाहर निकल कर नये क्षेत्रों में भी हाथ आजमाना चाहती हैं। बढ़ती आबादी सिमटते शहर और सिमटते संसाधन ग्रामीण संस्कृति पर खतरा बन कर मंडराने लगे थे। गांवों के वजूद को बचाने के लिए जरूरी था कि लोगों को उनके माहौल ही में जीने के साधन मौहय्या कराए जांए। आजीविका मिशन और झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रोमोशन सोसायटी ने इस काम को बखूबी अंजाम दिया है। आदिवासी बहुल झारखंड की महिलांए भी पूरे दम खम के साथ समूह बनाने और चलाने में जुटी हैं। वह समझ सकती हैं कि यहीवह ताकत है जो उन्हें उनकी जड़ों से जोड़े रख सकती हैं। उन्हें उनके हिस्से की रोटी और माटी दे सकती हैं। उनके लिए बेहतर कल की इकलौती उम्मीद है आजीविका।

अज़ीज़ हैदर

(Article exclusively done for Outlook Magazine)

 

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