जीवन दायी महासागर और उनसे अंतरंग होता मानव

वर्ष 1998 की बात है जब तत्कालीन सागर संपदा सेल का उन्नयन करके पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के सीधे अधीन  सेंटर फार मरीन लिविंग रिसोर्सेज़ एंड इकोलाजी (सीएमएलआरई) की स्थापना की गई थी ताकि समुद्रीय जीवित संसाधन  (एमएलआर) कार्यक्रम को लागू किया जा सके। तब से सीएमएलआरई देश में सागर विकास गतिविधियों को संगठित करने, समन्वयित करने और बढ़ावा देने में लगा है, जिसमें अन्य बातों के अलावा जीवित संसाधनों के मानचित्रण, व्यावसायिक रूप से शोषित किए जाने वाले समुद्रीय संसाधनों का सूचिकरण और समुद्रीय जीवित संसाधनों और इकोलाजी को समझने हेतु अनुसंधान और उनके इष्टतम उपयोग की कोशिशों में लगा है।

20 वर्ष पूर्व उस छोटी सी शुरूआत से आगे बढ़ते हुए यह स्पष्ट हो गया कि सीएमएलआरई ने प्रगति और विकास की दिशा में एक लंबा सफर तय कर लिया है जब डा. एम सुधाकर निदेशक, (सीएमएलआरई) और वरिष्ठ वैज्ञानिक एन सरवानाने की उपस्थिति में केंद्रीय मंत्री डा. हर्षवर्धन ने काकानाड, कोची स्थित सीएमएलआरआई इंस्टीट्यूट में बोलते हुए सीएमएलआरआई को इस क्षेत्र से संबंधित सभी क्षेत्रों के समन्वय के लिए एक राष्ट्रीय केंद्र के रूप में विकसित करने की आवश्यकता पर जोर दिया ताकि देश की समुद्र से जुड़ी इकोसिस्टम आधारित प्रबंधन रणनीति का विकास किया जा सके। डा. एम  सुधाकर जो वर्षों से सीएमएलआरई से जुड़े हैं बताते हैं कि यह भारत की एकमात्र संस्थान है जो गहरे समुद्र में जीवित संसाधनों के शोध में लगी है। सीएमएलआरई द्वारा निभाई जा रही भूमिका का विस्तार पूर्वक उल्लेख करते हुए वह कहते हैं, सीएमएलआरई को एक राष्ट्रीय केंद्र के रूप में स्थापित किया गया है ताकि हमारे देश के समुद्रीय जीवित संसाधनों पर शोध को बढ़ावा मिले और इसके तहत इकोसिस्टम प्रक्रियाओं के मल्यांकन और जीवित संसाधनों के संरक्षण और उपयोग आदि को फोकस करके कई अध्ययन किए जा चुके हैं।

इन पहलुओं पर हमारी समझ में काफी हद तक सुधार हुआ है, हालांकि अभी भी कई अनसुलझे मुद्दे हैं;  1) क्या तटीय प्रदूषण वास्तव में महत्वपूर्ण है और समुद्रीय जीवित संसाधनों को प्रभावित कर रहा है;  2) क्या कारण हैं जो समुद्रीय मछली के वितरण और संख्या को प्रभावित करते हैं,  3) उनके प्रजनन पर किन चीज़ों का प्रभाव पड़ता है;  4) प्रतिकूल प्र्यावरणीय परिस्थितियों का प्रभाव जैसा कि अल-निनो वर्षों में समुद्रीय वार्मिंग और तेजा़बीकरण देखा गया;  5) हमारे भारतीय समुद्र में जैव-विविधता और उसका अभिलेखीकरण;  6) गहरे समुद्र के अपरंपरागत मत्स्य संसाधन और तटीय पारिस्थितिकी तंत्र के साथ संबंध, आदि।

समुद्र की हमारी समझ के आधार पर कई ठोस प्रयास किए गए हैं, मुख्य रूप से इकोसिस्टम तंत्र दृष्टिकोण आधारित अध्ययनों के माध्यम से। इससे पूर्व सीएमएलआरई ने 2017-20 के दौरान दो गहन परियोजनाएं की हैं।  अ) पूर्वी अरब सागर की समुद्रीय इकोसिस्टम डाइनेमिक्स और,  ब)  संसाधन एक्सप्लोरेशन सिस्टम दोनों का संयुक्त उद्देश्य ऊपर उल्लिखित प्रमुख मुद्दों को संबोधित करना है।

सीएमएलआरई की गहरे समुद्र में सक्रिय गतिविधियों को निम्नलिखित साझा कार्यक्रमों द्वारा समझा जा सकता हैः (i) ओशन बायोग्राफिक सूचना प्रणाली (OBIS)  (ii) अंटार्कटिक समुद्रीय जीवित संसाधनों के संरक्षण के लिए आयोग (CCAMLR)  (iii) बेल्मोंट फोरम – जैव विविधता और इकोसिस्टम सेवाएं  (iv) जैविक विविधता पर कन्वेंशन; और  (v) राष्ट्रीय न्यायक्षेत्र से परे जैविक विविधता  (BBNJ)  जो कि संयुक्त राष्ट्र संघ का समुद्रीय कानून हेतु कन्वेंशन  (यूएनसीएलओएस) के तहत प्रस्तावित एक नया कानूनी साधन है। इन कार्यक्रमों और गहन अनुसंधान के बल पर भारत हमारे समुद्रीय जैविक संसाधनों और जीवन को भविष्य की आवश्यकताओं हेतु अध्ययन और उपयोग करने की क्षमता को बढ़ावा दे रहा है।

डा सुधाकर कहते हैं ‘‘समुद्री जैव विविधता कार्यक्रम के तहत हम भारतीय जल में उपलब्ध विभिन्न प्रजातियों की पहचान करने का प्रयास करते हैं और हम अब गहरे समुद्र में मत्स्य पालन और दूरी पर स्थित जल में मत्स्य पालन पर काम कर रहे हैं। आगे बताते हुए वह कहते हैं कि एमएलआरई ने सजावटी मछलियों की 5 प्रजातियों की पहचान की है जिनकी विदेशों में बड़ी मांग है और इन्हें पालने और प्रजनन के लिए प्रौद्योगिकी विकसित की है।

अंटार्कटिक समुद्रीय संसाधनों के अन्वेषण और शोषण का सर्वोच्च महत्व है खासकर इसलिए क्योंकि भारत सहित 26 देशों ने, यहां तक कि दूर स्थित नार्वे जैसे देशों ने, अंटार्कटिक क्षेत्र में शोध और अन्वेषण हेतु कोटा आवंटन किया है। जबकि नार्वे जैसे देश खाद्य वैकल्पिक आवश्यकताओं के रूप में अंटार्कटिक क्षेत्र को देख रहे हैं, डा  सुधाकर का कहना है कि ‘‘हमें देखना होगा हमारे देश और उसकी आवश्यकताओं के लिए यह क्षेत्र कितना व्यवहार्य है। हालांकि यह स्पष्ट है कि सीएमएलआरई को भारत सरकार से बहुत समर्थन चाहिए यदि भारत अपने गहरे समुद्र मिशन और गहरे पानी में मछलियों पर शोध करने और उन्हें पकड़ने की दिशा में आगे क़दम बढ़ाता है। सीएमएलआरई निदेशक बताते हैं कि इस कार्य हेतु उन्हें भारत सरकार से वांछित समर्थन मिल रहा है।

डा़ के  सोमसुंदर, जो कि मंत्रालय में वैज्ञानिक और सलाहकार हैं, बताते हैं कि भारत सरकार अब सस्टेनेबल विकास लक्ष्य संख्या 14  (एसडीजी-14) का कार्यान्वयन शुरू कर चुकी है जो मुख्य रूप से पानी से नीचे जीवन को कवर करता है। संयुक्त राष्ट्र ने महासागरों के लिए विशेष लक्ष्यों को निर्दिष्ट करने हेतु चार्टर बनाया है और भारत इस पर हस्ताक्षरकर्ता है। हाल ही में आयोजित महासागर सम्मेलन में कई देशों ने स्थायी एसडीजी-14 हासिल करने के लिए स्वैच्छिक प्रतिबद्धताओं की घोषणा की है, मुख्य रूप से समुद्र के संसाधनों का बचाव और संरक्षण और प्रदूषण और उसके प्रभावों को कम से कम करना इस में शामिल है।

एसडीजी-14 के मुख्य बिंदुओं और कार्यान्वयन के लिए भारत द्वारा राष्ट्रीय सूचकांक तैयार किया गया है, इसके अलावा वैश्विक स्तर पर संयुक्त रूप से एक सूचकांक तैयार किया गया है जिसमें भारत भी हष्ताक्षरकर्ता है। एसडीजी-14 के तहत 10 मुख्य लक्ष्यों को मोटे तौर पर चार श्रेणियों में वर्गीकृत किया जा सकता है।  (1) समुद्रीय प्रदूषण को रोकना और कम करना; (2)समुद्रीय संसाधनों का संरक्षण और सही उपयोग; (3) वैज्ञानिक क्षमता में वृद्धि; और, (4) संयुक्त राष्ट्र द्वारा बनाए कानूनों को लागू करना ताकि समुद्रीय संसाधनों का सही मात्रा में उपयोग किया जा सके।

डा़ सुधाकर बताते हैं कि वर्तमान में आयोजित की जाने वाली गतिविधियां चार व्यापक क्षेत्रों में विभाजित की जा सकती हैं  जीवित संसाधन, गैर-जीवित संसाधन, सागर अवलोकन और बुनियादी ढांचे को बेहतर बनाना। गैर-जीवित संसाधनों पर काम के तहत जल धाराओं और समुद्रीय लहरों के उपयोग से ऊर्जा उत्पन्न करने का काम चल रहा है । लक्ष्यद्वीप में तीन प्लांट चल रहे हैं जो रोज़ाना 1 लाख लीटर ताज़ा पीने के पानी का उत्पादन कर रहे हैं। लक्ष्यद्वीप के अलग अलग हिस्सों में 4 और प्लांट लगाने का कार्य चल रहा है। इसके अलावा एक संयंत्र जल्द ही आने वाला है जो पानी से ऊर्जा पैदा करेगा और इसी ऊर्जा का उपयोग इस थमर्ल प्लांट को संचालित करने के लिए किया जाएगा।

अधिक विस्तार से बात करते हुए डा. पूर्णिमा जलीहल, जो नेशनल इंस्टीट्यूट आफ ओशन टेक्नोलाजी (एनआईओ टी) परियोजना समन्वयक हैं बताती हैं कि ‘‘हम समुद्र से ऊर्जा प्राप्त करने की दिशा में काम कर रहे हैं। समुद्रीय लहरों और समुद्र के विभिन्न स्तरों पर ताप में अंतर को ऊर्जा प्राप्ति के लिए उपयोग में लिया जाता है। हम ने पहली बार समुद्रीय लहरों में उपलब्धऊर्जा से संचालित ब्याय को विकसित किया है जो हमारे देश की बंदरगाहों के लिए बहुत उपयोगी होगा। साथ ही हम ने पहली बार एक हाईड्रो-काईनेटिक टरबाइन विकसित किया है जो पानी के वेग को उपयोग में लाता है। इसके अलावा हम समुद्र में तापीय ऊर्जारूपांतरण पर काम कर रहे हैं जो पानी की सतह और गहराई में तापमान में अंतर को ऊर्जा पैदा करने के लिए उपयोग करता है। थर्मल ग्रेडिएंट का उपयोग ताजे़ पीने के पानी के लिए भी किया जा रहा है।

भाप उत्पन्न करने के लिए पावर का उपयोग किया जाता है जो कि गहरे समुद्र के ठंडे पानी से फिर पानी में परिवर्तित की जाती है ताकि ताज़ा पीने का पानी प्राप्त किया जा सके। इस तकनीक के माध्यम से लक्ष्यद्वीप के तीन द्वीपों में ताज़ा पानी की आवश्यकता को सुलझाने में काफी मदद मिली है।

डा़ जलीहल बताती हैं कि एनआईओटी इस तकनीक को अब मेनलेंड में उपयोग करने की तैयारी कर रहा ह। ओटीईसी द्वारा संचालित एक प्लांट कावरट्टी में लगाया जा रहा है। एक दिन में 20 लाख लीटर ताज़ा पानी की क्षमता के टूटीकोरिन थर्मल पावर प्लांट का डिज़ाइन तैयार हो चुका है।

महासागरों में बहुत से गैर-जीवित संसाधन भी होते हैं और तकनीकी प्रगति ने इन संसाधनों का उपयोग संभव बना दिया है। मंत्रालय मे वैज्ञानिक जी के रूप में कार्यरत डा एमपी वाकदिकर जो मंत्रालय में कार्यक्रम प्रमुख की भूमिका भी निभाते हैं बताते हैं कि अंतरराष्ट्रीय गहरे समुद्र में बड़ी मात्रा में मौजूद खनिज संसाधनों की खोज पर भी हमारी गतिविधियां केंद्रित हैं। भारत पहला देश था जिसको सेंट्रल हिंद महासागर के अंतरराष्ट्रीय जल में पालीमेटेलिक नोडूल्स के अन्वेषण के लिए एक लाख साठ हज़ार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र प्रदान किया गया। यह नोडूल्स आलू की शकल की संरचनाएं हैं जो गहरे समुद्र में समुद्र तल पर पानी की सतह से लगभग 4 से 6 किलोमीटर नीचे पाए जाते हैं। डा  एम पी वाकदिकर कहते हैं  ‘‘हमारे पास अंतरराष्ट्रीय सी-बेड प्राधिकरण के साथ अनुबंध था जो कि एक संयुक्त राष्ट्र संस्था है और गहरे समुद्र में शोध का व्यवस्थीकरण करता है।  डा़ सुधाकर अंतरराष्ट्रीय सी-बेड प्राधिकरण के कानूनी एवं तकनीकी आयोग के सदस्य भी हैं।

समुद्रीय तल पर मौजूद इन पालीमेटेलिक नोडूल्स में मैंगनीज़ के अलावा तांबा, निकल और कोबाल्ट भारी मात्रा में पाया जाता है। हालांकि इन नोडूल्स से खनिजों को निकालने के लिए तकनीक का विकास अभी भी संभव नहीं हो पाया है। भारत के अतिरिक्त चीन और कोरिया वे तीन देश हैं जो इन नोडूल्स से खनिजों को निकालने की प्रौद्योगिकी विकसित करने में लगे हैं। यह माना जा रहा है कि 2021 तक भारत इनसे खनन की क्षमता को विकसित करने में सक्षम हो जाएगा। इस संबंध में एनआईओटी के वैज्ञानिक बहुत प्रयास कर रहे हैं।

पालीमेटेलिक सल्फाइड के अन्वेषण के लिए एनआईओटी एक अन्य कार्यक्रम पर काम कर रहा है। हिंद महासागर में भारत के अन्वेषण के परिणामस्वरूप इस क्षेत्र में शोध करने के लिए पिछले साल नेशनल सेंटर फार अंटार्कटिक और महासागर अनुसंधान एनसीएओआरद्ध के साथ एक अनुबंध किया गया है।

एनसीएओआर के कार्यक्षेत्र की अधिक जानकारी देते हुए इसके निदेशक डा़ रविचंद्रन कहते हैं कि उनका संगठन ध्रुवीय विज्ञान का भारतीय प्रवेश द्वार है जो ध्रुवीय क्षेत्रों (अंटार्कटिका, आर्कटिक और हिमालय के तीन ध्रुवों) में और दक्षिणी महासागर में वैज्ञानिक शोध के नियोजन, समन्वय और बढ़ावे के लिए जिम्मेदार है, विशेष रूप से मानसून टेली-कनेक्शन और गत इतिहास को सामने लाने में इसका महत्वपूर्ण योगदान है। पोलर क्षेत्रों में शोध के अतिरिक्त एनसीएओआर के ज़िम्मे कुछ महत्वपूर्ण भू-विज्ञान परियोजनाओं में शामिल है भारत के विशेष आर्थिक क्षेत्र का मानचित्रण, भारत की कांटिनेंटल शेल्फ रीजन को बढ़ाना, अंतरराष्ट्रीय महासागर में खोज को बढ़ावा देना और साथ ही गैर-जीवित संसाधनों जैसे कि पालिमेटेलिक नोडूल्स और हाईड्रोथरमल सलफाइड का पता लगाना।

डा. रविचंद्रन बताते हैं कि तीनों ध्रुवों में हम लगातार विभिन्न भौतिक, जैविक और भूवैज्ञानिक मापदंडों की निगरानी करते हैं और ध्रुवीय पारिस्थितिकी तंत्र, बर्फ की गतिशीलता, मौसम पैटर्न और महासागर गतिशीलता को समझने के लिए व्यापक क्षेत्रीय सर्वेक्षण भी आयोजित किए जाते हैं। एनसीएओआर का मैंडेट काफी फैला हुआ और चुनौतीपूर्ण है। अंटार्कटिक में भारत के स्थायी केंद्र के रखरखाव सहित भारतीय अंटार्कटिक कार्यक्रम के समन्वय और कार्यान्वयन के लिए केंद्र को नोडल संगठन के रूप में नामित किया गया है। विभिन्न संगठनों और विश्वविद्यालयों के वैज्ञानिक इसके ध्रुवीय कार्यक्रमों में भाग लेते हैं। विभिन्न बर्फ कोर का पता लगाने और धातु विश्लेषण के लिए गोवा में एक प्रयोगशाला बनाई गई है जो शोधकार्य में लगी है।

एक और संस्था आईएनसीओआईएस मछुआरों को सलाह प्रदान करने का काम कर रही है। उपग्रह डाटा का उपयोग करके संभावित मछली पकड़ने के इलाक़ों का पता लगाया जा रहा है और मछली पकड़ने के लिए कहां जाना बेहतर है बताया जाता है। इसकी जानकारी देते हुए आईएनसीओआईएस और एनआईओटी के निदेशक डा . सतीश सी शैनाय बताते हैं कि मछुआरों को किनारे से लगभग 50-75 किलोमीटर तक समुद्रीय सतह का तापमान और क्लोरोफिल की उपलब्धता से संबंधित डेटा दिया जाता है जो उन्हें मछलियों की खोज में कब और कहां जाना है इसका पता लगाने में मदद करता है। भारत में लगभग 10 लाख पारंपरिक मछुआरों में से अनुमानित 4 लाख सक्रिय मछुआरे इन सेवाओं का उपयोग कर रहे हैं।

शैनाय विस्तारपूर्वक जानकारी देते हुए बताते हैं ‘‘मछुआरे जानना चाहते हैं कि उनके लिए मछली पकड़ने के लिए जाना कितना सुरक्षित है। हमने उन्हें ओशन स्टेट पूर्वानुमान के नाम से जानकारी देना शुरू किया है जिसमें हम लहरों, समुद्रीय धाराओं, समुदीय तापमान और अन्य संबंधित सूचकांकों पर पूर्वानुमान प्रदान करना प्रारंभ किया है। यह अपडेड रोज़ाना अगले पांच दिनों के लिए प्रदान किया जाता है। आमतौर पर छोटे मछुआरे दो-तीन दिनों के लिए मछली पकड़ने समुद्र में जाते हैं। इन पूर्वानुमानों से उन्हें यह तय करने में मदद मिलती है कि समुद्र में जाना सुरक्षित है कि नहीं।

तीसरी गतिविधि जो चलाई जा रही है वह सुनामी की शुरूआती चेतावनी है। शैनाय बताते हैं कि ‘‘हमारे पास भारतीय सुनामी प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली है और युनेस्को ने हमें क्षेत्रीय सुनामी सेवा प्रदाता के रूप में नामित किया है। इसका अर्थ है कि हिंद महासागर में जब भी 6.5 तीव्रता से अधिक का भूकंप आता है तुरंत ही हिंद महासागर में सभी देशों के लिए सुनामी सेवाएं मुहैयया कराई जाती हैं। यह जानकारी भारत के अतिरिक्त 22 अन्य देशों को प्रदान की जा रही हैं।

इसके अलावा, जलवायु परिवर्तन के मुद्दों का महत्व अधिक बढ़ता जा रहा है। ‘‘इस वर्ष हमने हिंद महासागर के संबंध से जलवायु परिवर्तन के दृष्टिकोण से माडलिंग के लिए नई गतिविधियां शुरू की हैं। यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि हिंद महासागर दूसरे सभी महासागरों की तुलना में अधिक तेज़ी से गर्म हो रहा है। हमने एक वैश्विक माडल का निर्माण किया है और इसे हिंद महासागर पर केंद्रित किया है। एक और गतिविधी जो शुरू की गई है उसके अंतर्गत हिंद महासागर में प्रदूषण के स्तर के बढ़ने के अध्ययन के साथ भारत के चारों ओर पानी की बायोज्योकैमिस्ट्री का अध्ययन करना है।

यह सब सीएमएलआरई के पास मौजूद उच्च तकनीक से बने समुद्र विज्ञान अनुसंधान पोत (FORV)जिसका नाम सागर संपदा है और सीएमएलआरआई के पास उपलब्ध दो अन्य छोटे पानी के जहाज़ों के बिना मुमकिन नहीं था। सागर संपदा जिसकी उम्र अब 33 साल की है, ने हमारे देश की ज़रूरतों को लेकर निरंतर सेवा की है और आज भी – हालांकि कुछ कम दक्षता के साथ – निरंतर सेवाएं प्रदान करने में लगा है। सुधाकर बताते हैं कि इस थ्व्त्ट के प्रतिस्थापन की प्रक्रिया पहले ही शुरू की जा चुकी है और बहुत सारी चर्चा और परामर्श के बाद इसकी तकनीकी विशिष्टताओं को अंतिम रूप दिया गया है। अल्ट्रा-आधुनिक विशिष्टताओं के साथ यह नया थ्व्त्ट सागर संपदा के बाद देश का एकमात्र गहरे समुद्र में प्रयोग हेतु पोत होगा और उम्मीद की जा रही है कि जिस प्रकार बूढ़े होते सागर संपदा ने देश के लिए अपनी सेवाएं प्रदान कीं उसी प्रकार यह भी समुद्रीय जीवन के अध्ययन के लिए भारत के लिए अतिमहत्वपूर्ण साबित होगा। थोड़े समय ही कि बात है जब एक नए पोत पर भारत का ध्वज फहराएगा और यह गहरे समुद्रों को चीरता हुआ जीवन दायी महासागरों से अंतरंग होने की मानव कोशिशों को नये आयाम प्रदान करेगा।

अज़ीज़ हैदर

(Article Exclusively done for Outlook Magazine)

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