ईरान का मीठा तेल, अमरीका के लिए कड़वा सच

उसके कथित रूप से शांतिपूर्ण परमाणु कार्यक्रम पर चिंता के बहाने ईरान पर लगाए गए एकतरफा प्रतिबंधों के जवाब में ईरान ने ब्रिटिश और फ्रांसीसी कंपनियों को तेल निर्यात बन्द कर दिया है। अलर्ट आर0एन0आई0 एक्टिविस्ट जहीर जैदी के माध्यम से मिले इस लेख में हम कमेंटेटर नादिर मोखतारी के विचार प्रस्तुत कर रहे हैं जिनका कहना है कि आर्थिक मंदी के चलते यूरोपीय देश पिछले छह महिने से ईरान से लिए गए तेल की कीमत का भुगतान करने में असमर्थ थे और अब के बजाए जूलाई से प्रतिबन्ध लगा कर वे छह महीने और मुफत में ईरानी तेल प्राप्त करना चाहते थे जिसके बाद वह प्रतिबन्ध का बहाना लगा कर तेल की कीमत अदा करने से बच जाते।

प्रमुख स्तंभकार और कमेंटेटर नादिर मोखतारी ने एक साक्षातकार में विस्तार से इस मुद्दे पर चर्चा की है जिसका प्रतिलेखन यहां दिया जा रहा हैः

प्रश्नः यदि आप बता सकें तो बताएं कि ऐसा क्यों है कि ईरान ने ब्रिटिश और फ्रांसीसी कंपनियों को तेल बिक्री बन्द कर दी जब्कि प्रतिबन्ध जूलाई में लागू होने थे आप का इस बारे में क्या विचार है?

नादिर मोखतारीः बिक्री आदान प्रदान का नाम है। आप माल देते हैं तो बदले में भुगतान मिलता है। हुआ यह कि फ्रांस और अन्य पांच देशों को दिये गए तेल का भुगतान काफी समय से बाकी था। ईरान में कई लोगों को यह पता है कि ईरान के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम को बहाना बनाकर यह यूरोपीय देश जिन्होंने गत छह महीनों से आयात किये गए तेल का भुगतान नहीं किया है छह महीने और मुफत में तेल प्राप्त करना चाहते थे। यदि यूरोप ने पिछले छह महीनों से अपने तेल का भुगतान नहीं किया है और इसे और खींच कर ईरान से एक साल के लिए मुफत तेल प्राप्त करना चाहता है तो अपनी अतीत की साम्राज्यवादी मानसिकता के तहत वह ऐसा सोच सकते हैं पर 21वीं सदी में ऐसा मुमकिन नहीं है।

यह कहना कि ईरान के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के चलते यह प्रतिबन्ध लगाए गए ऐसा सच नहीं है। उन्हें व्यस्क बनते हुए अपने बिलों का भुगतान करना सीखना चाहिए। परन्तु कड़वा सच यह है कि आर्थिक मन्दी के चलते वह अपने बिलों का भुगतान करने की हालत में नहीं हैं यहां तक कि ऋण भी नहीं चुका सकते और इसी कारण से मूडीज़ ने उनकी क्रेडित रेटिंग कम करने का फैसला किया है। इस कारण वह बहाने से तेल प्राप्त करना चाह रहे थे।

परमाणु कार्यक्रम केवल एक बहाना है खरीदी गई वस्तुओं की कीमत अदा करने से बचने का। पहले ईरान के परमाणु हथियार बनाने की बात करते थे। यदि आप ने ध्यान दिया है, पश्चिमी मीडिया खास कर अमरीका का मीडिया अब ईरान पर प्रतिबन्ध का औचित्य साबित करने हेतु परमाणु हथियारों की क्षमता जैसे वाक्यों का उपयोग कर रहे हैं] क्योंकि पहले वाली बात कि ईरान परमाणु हथियारों को बनाने में जुटा है विश्व स्तर पर स्वीकार नहीं की गई। वे इस प्रकार के हजार बहाने बनाएंगे ईरान पर हमले का औचित्य साबित करने के लिए क्योंकि वह जानते हैं कि ईरान ने पिछले 30 सालों में अपने को तकनीकी रूप से समृद्ध बनाया है, यहां तक कि अंतरिक्ष में राकेट और उपग्रह तक भेज दिए।

प्रश्नः ठीक है, यह बताएं कि यह प्रतिबन्ध कैसे नकारात्मक तरीके से ईरान को प्रभावित करेंगे, जैसा कि पश्चिमी देश कह रहे हैं।

नादिर मोखतारीः यूरोप में अस्सी रिफाईनरियों को ईरान का कच्चा तेल प्राप्त होता है जो बहुत हल्का मीठा और सलफर मुक्त तेल होता है। यह देखने में सोने जैसा, बहुत हल्का और बहुत सस्ते में रिफाईन होने वाला तेल है। यह सऊदी कच्चे तेल से विपरीत है जो टार की तरह बहुत गाढ़ा और अधिक सलफर मात्रा वाला तेल होता है। यदि वे सऊदी कच्चा तेल लेते हैं तो उन्हें अपनी रिफाईनरियों में बदलाव लाना पड़ेगा और उन्हें कहीं अधिक खर्चा करना पड़ेगा। अपनी रिफाईनरियों में बदलाव लाने में उन्हें दो महीने लग जाएंगे और सऊदी तेल को सलफर रहित करने पर दोगुना खर्चा आएगा। इस लागत की कीमत यूरोपीय उपभोकताओं को चुकानी होगी।

इस प्रकार ऐसा करना यथार्थवादी नहीं है। दूसरे जिस वित्तीय संकट से यूरोपी देश गुजर रहे हैं उसमें ऐसा करना उनके हित में नहीं है। जहां तक ईरान का सम्बंध है] इसका तेल विश्व में सब से हलका और मीठा है और कई एशियाई और दक्षिण अफ्रीकी देश इसे खरीदने को तैयार हैं। भारत ने इस वर्ष के लिए अपने कोटे में 50 प्रतिशत की वृद्धि की है और चूंकि पश्चिमी देशों ने धन हस्तांतरण से मना कर दिया है, भारत सोने] खाद्य वस्तुओं और रूप्ये की शकल में कीमत देने को तैयार है। भारत, पाकिस्तान और चीन से माल और सेवाओं के अफगानिस्तान के रास्ते से स्थानांतरण करने और ईरान से पाकिस्तान, भारत और चीन के लिए पाईपलाइन द्वारा तेल लाने के लिए भी व्यवस्था बनाई जा रही है। ईरान, अफगानिस्तान और पाकिस्तान के नेता इसी कारणवश कुछ दिन पूर्व पाकिस्तान में एकत्रित हुए थे।

अपने तेल या पेट्रोलियम उत्पादों के लिए ईरान को ग्राहकों की कमी कभी नहीं हो सकती। ईरान को विश्वास है कि यूरोप के विपरीत अन्य ग्राहक हैं जो उससे तेल लेने और तेल के बदले कीमत अदा करने को तैयार हैं। यहां तक कि रूस भी हमारे तेल को अपने दक्षिणी गणराज्यों की आपूर्ती के लिए खरीदने को उत्सुक है। यूरोपीय कहते हैं कि सऊदी अरब किसी भी कमी को पूरा कर देगा। यदि खाड़ी के देशों का प्रवेश द्वार] स्ट्रेट आफ होरमुज, को इज्राईल या अमरीकी/ब्रिटिश हमले की स्थिति में ईरान बन्द कर देता है तो सऊदी] अमीराती] कुवेती और ईराकी तेल का भी निर्यात रूक जाएगा। अमीरात से ओमान जा रही पाईपलाईन स्ट्रेट आफ होरमुज से हो कर रोज जाने वाले 17 लाख बैरल तेल का 6 प्रतिशत ही ले जा सकती हैं। सिर्फ यही नहीं, स्ट्रेट आफ होरमुज से तेल लेकर जा रहे सुपर टैंकर ईरानी पानी में होकर ही गुजर सकते हैं। यदि स्ट्रेट आफ होरमुज तीन से छह महीनों के लिए बन्द कर दी जाती है तो न केवल यूरोपीय संघ बल्कि खाड़ी क्षेत्र, चीनी, जापानी, भारतीय और कोरियाई अर्थव्यवस्था का नाश होगा। डालर और यूरो धूल चाटेगा।

ऐसी नई विश्व व्यवस्था के निमार्ण की आवश्यकता है जिसमें अमरीका ही अकेली महाशक्ति नहीं रहे। दूसरी ओर यूरोपीय संघ जिसके पास कोयले, आलू और उत्तरी सागर में बहत थोड़े से तेल के अतिरिक्त अपना कहने को कुछ नहीं है, दुनिया के बीमार आदमी की तरह कम से कम कुछ और समय के लिए अपने बूढे़ होते हथियारों से विश्व को तबाह करने में जुटा रहेगा। लीबिया इसका जीता जागता उदाहरण है!

इस साक्षातकार पर टिप्पणी करते हुए ज़हीर जैदी कहते हैं कि वह समय दूर नही जब अमरीका की चैधराहट खाक में मिल जाएगी। अमरीका के पास विनाशकारी हथियारों के अतिरिक्त बेचने को कुछ भी नहीं। लगता है अमरीका के दिन पूरे हो गए हैं। ईरान पर हमला अमरीका के लिए वाटरलू साबित हो सकता है। इज्राईल पहले ही हिज्बुल्ला से डर कर भाग चुका है। यदि ईरान और हिज्बुल्ला खुल कर सामने आ गए तो दोनों देशों की खैर नहीं।

आर0एन0आई0 न्यूज़ नेटवर्क

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