सबूतों का हवाला देते हुए मुस्लिम विद्वान ने दावा किया कि वंदे मातरम् का गायन धर्म के खिलाफ नहीं है

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आर एन आई, नई दिल्लीः

एक मुस्लिम विद्वान ने कई सबूतों का हवाला देते हुए दावा किया है कि वंदे मातरम् का गाना इस्लाम की शिक्षा के खिलाफ नहीं है। आर एन आई द्वारा एक विशेष अनुरोध के जवाब में अपने विचार देते हुए मौहम्मद अलवी जो स्वयं कोईश्वर के मार्ग का एक छोटा सा छात्रकहना पसन्द करते हैं बताते हैं कि अब तक वंदे मातरम् गाने से मुसलमानों की किनाराकशी हिन्दू आस्था और धर्म की गलत समझ के कारण थी। अन्त में अलवी इस निष्कर्श पर पहुंचते हैं कि जिस अपमान से मुसलमान गुजर रहे हैं वह कुरान और इस्लाम की दीक्षा से दूरी बना लेने के कारण है। स्वयं अलवी के ही विचार पढि़येः

ईश्वर के अतिरिक्त किसी की भी पूजा को मुसलमान शिर्क – एक बड़े अपराध – के रूप में देखते हैं। चूंकि गीत वंदे मातरम् भारत माता की पूजा की धारणा पेश करता है इस कारण से भारत में कई मुस्लिम संगठनों ने वंदे मातरम् गायन के खिलाफ फतवे की घोषणा की है। वंदे मातरम् विशेष रूप से देवी दुर्गा की स्तुति में एक भजन है। इस तथ्य का समर्थन स्वयं रवीन्द्र नाथ टैगोर ने भी किया है। 1937 में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को लिखे एक पत्र में टैगोर ने लिखा थाः ‘वंदे मातरम् अस्ल में देवी दुर्गा को समर्पित एक भजन हैः यह तथ्य इतना साफ है कि इस पर कोई बहस नहीं हो सकती।’’

मैं समझता हूं कि जो नेता राष्ट्रहित के स्थान पर अपने निजी स्वार्थ को सर्वोप्रिय रखते हुए इसको सांप्रदायिक हिन्दू मुसलमानों के बीच का मुद्दा बना देते हैं उनको पता होना चाहिए कि मुसलमानों का वंदे मातरम् न गाने का कारण देशभक्ती की अनदेखी या अनादर नहीं है बल्कि इसलिए है कि इस्लाम में एक ईश्वर के अतिरिक्त किसी की भी पूजा करना बड़ा पाप माना गया है। हिन्दुओं के प्रिय सभी शास्त्र भी एक निरपेक्ष ईश्वर की ही बात करते हैं। इस कारण मुझे लगता है कि हिन्दुओं को भी मुसलमानों के इस रूख का सम्मान करना चाहिए।

मत्स्स पुराण का कहना है कि केवल एक ही देवी है जिसे अलग अलग नामों से भारत के विभिन्न इलाकों में जाना जाता था परन्तु समय के साथ लोगों ने उन्हें विभिन्न देवियों के रूप में मानना शुरू कर दिया। बंगाल के क्षेत्र में लोग इस एक देवी को दुर्गा के नाम से पुकारते थे। मेरे कई लेखों में साबित किया गया है कि हिन्दू ग्रंथों में इस एक देवी को ईश्वर नहीं माना गया है। हिन्दू शास्त्रों को पढ़ें तो वहां भी ईश्वर एक और निरपेक्ष है। शब्द ‘देव’ या ‘देवता’ या ‘देवी’ का स्त्रोत ‘दिव्य’ है जिसके अर्थ प्रकाश या किसी प्रबुद्ध वस्तु के हैं जो कुरान के ‘नूर’ के समान है। कुरान और पैगम्बर मौहम्मद के कथनों में नूर की उत्पत्ति का उल्लेख है। पैगम्बर मौहम्मद ने स्वयं के बारे में क्हा कि मेरा नूर आदम की उत्पत्ति से बहुत पहले बनाया गया था। इस तर्क से पैगम्बर मौहम्मद भी एक देवता (प्रकाश/नूर से उत्पत्ति के कारण) हुए। लिखा है कि पैगम्बर मौहम्मद और उनके अहलेबैत का नूर चांद, सितारों, सूर्य और पृथ्वी के निमार्ण से पहले बना। एक को छोड़ मुसलमानों के तमाम संप्रदाय इस को मानते हैं। इसी तरह वेदों में आया है कि ईश्वर ने देवताओं और देवी को ब्रहमाण्ड की रचना से पहले बनाया और उन्हें ईश्वर द्वारा निर्मित इस ब्रहमाण्ड में एक भूमिका सौंपी गई। अधिकतर हिन्दू विद्वान भी इस बात को मानते हैं कि बड़ी भूमिका होने के बावजूद यह ईश्वर नहीं हैं। यह अंग्रेजी जबान का दुर्भाग्य है कि उसमें रौशनी या नूर से बनाए गए (देवताओं या देवी) के लिए कोई उप्युक्त शब्द नहीं है जिसके कारण वे इसका अनुवाद छोटे ‘g’ से ‘god’ करते हैं।

शब्द ‘मातरम’ अथार्त ‘मेरी मां’ राष्ट्र के लिए प्रयोग किया गया है। हजरत अली के कथन से पता चलता है कि राष्ट्र को मां कह कर सम्बोधित करना जाएज है। ऐसा प्रतीत होता है कि हजरत अली को 1400 पहले पता था कि आगे चल कर यह विवाद उठेगा। नहजुल बलागा के उद्धरण 313 में हजरत अली कहते हैंः

‘‘लोग इस दुनिया की संतान हैं और कोई भी अपनी मां से प्यार करने के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता।’’

अब किसी और फतवे की आवश्यकता नहीं। इस विषय पर हजरत अली के वक्तव्य से बड़ी क्या गारंटी होगी कि मां के रूप में देश या दुनिया की वंदना करना इस्लाम की दृष्टि में कोई पाप नहीं है।

भारतीय आज जब वंदे मातरम गाते हैं तो किसी के भी मन में यह तथ्य नहीं आता कि यह गीत बंकिम चंद्र चटर्जी द्वारा लिखित विवादास्पद उपन्यास का हिस्सा था। मन में केवल देश भक्ति और प्रेम की भावना पैदा होती है। वंदे मातरम गीत का मूल या उद्देश्य जो भी हो, इस में कोई शक नहीं कि यह गीत मातृभूमि की वैसे ही अराधना करता है जैसे अल्लामा इकबाल द्वारा लिखित ‘सारे जहान से अच्छा हिन्दुस्तान हमारा’। 1857 के गदर के बाद (जिसमें देश के लिए अधिकतम कुरबानियां मुसलमानों ने दीं थी) यह गीत देशभक्ति के जोश और वलवले का प्रतीक बन गया। यह वह समय था जब ब्रिटिश प्रशासन ‘ईश्वर महारानी को बचाए रखे’ (God save the queen) गान को बढ़ावा देने की कोशिश कर रहा था जिसको भारतवासी नापसन्द करते थे। फलस्वरूप शीघ्र ही वंदे मातरम् स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान ब्रिटिश शासन से आजादी पाने के लिए राष्ट्रव्यापी नारा बन गया। बंगाल से शुरू हुई यह आवाज जिसमें बड़ी रैलियों में देशभक्त वंदे मातरम् अथार्त ‘(मातृ) भूमि की जय’ के नारे लगाते थे देश के कोने कोने से गूंजने लगी। वंदे मातरम् पढ़ कर भारतवासियों के अंग्रेज सरकार के खिलाफ खड़े हो जाने के सम्भावित खतरे से भयभीत होकर अंग्रेज सरकार ने सार्वजनिक मंचों से वंदे मातरम् पढ़ने पर पाबंदी लगा दी और इस बहिष्कार की अवहेलना करने के लिए कई स्वतंत्रता सेनानियों को कैद में डाल दिया। रवीन्द्र नाथ टैगोर ने 1896 के कलकत्ता कांग्रेस सैशन में वंदे मातरम् गाया। पांच वर्ष बाद 1901 में दखिण चरण सेन ने कलकत्ता में ही आयोजित कांग्रेस सैशन में इसको गाया। 1905 में कवयित्री सरला देवी चैदुरानी ने बनारस कांग्रेस सैशन में इस गीत को गाया। लाला लाजपत राय ने लाहौर से ‘वंदे मातरम्’ नामी पत्रिका को शुरू किया। हीरालाल सेन ने 1905 में भारत की पहली राजनीतिक फिल्म बनाई जो इसी गीत पर समाप्त हुई। अंग्रेज सरकार के हुक्म पर पुलिस के हाथों गोली से मार दिए जाने से पहले मतंगिनी हाजरा के मुख से निकले अंतिम शब्द ‘वंदे मातरम्’ ही थे।

यह इस बात का प्रर्याप्त सबूत है कि देश भक्ति और राष्ट्र मां से प्यार के अतिरिक्त ‘वंदे मातरम’ के कोई दूसरे अर्थ नहीं हैं जैसा कि बंकिम चंद्र के उपन्यास की पृष्ठभूमि को देखकर कई मुसलमान अंदाजा लगाते हैं। पैगम्बर मौहम्मद के कथानुसार वतन से मौहब्बत हर मुसलमान पर अनिवार्य की गई है। हमारा कर्तव्य है कि देश और उसके संविधान का आदर करें।

अंत में मैं यह कहूंगा कि बहुत से दोष हैं जो हमारे अन्दर पैदा हो गये हैं ठीक वैसे जैसे कई दोष हिन्दुओं के अन्दर आये हैं। हिन्दु आस्था और सोच में आए दोष यहां चर्चा का मुद्दा नहीं हैं। किसी अन्य समय हम इसकी बात कर सकते हैं। हम मुसलमानों को प्राथना एवं कोशिश करनी चाहिए कि हमारे अन्दर जो दोष आ गये हैं उन्हें दूर करें। आज से 1400 वर्ष पूर्व अमीरूलमोमिनीन हजरत अली ने (नहजुल बलागा के उद्धरण 379) में भविष्यवाणी कर दी थी कि ऐसा समय आएगा। वह कहते हैंः ‘‘एक समय आयेगा जब कुरान में सिवाय लेखन के और इस्लाम में सिवाय नाम के कुछ नहीं बचेगा। उन दिनों में मस्जिदों में निमार्ण को लेकर व्यस्तता दिखेगी परन्तु मार्गदर्शन को लेकर मस्जिदें उजाड़ हो जाएंगी। उन में जो रह रहे होंगे और वहां जो जा रहे होंगे वह पृथ्वी के सबसे बुरे लोग होंगे। उनमें शरारत घर कर जाएगी और बुराई उनकी ओर लपकेगी। अगर कोई उनकी (शरारत) से दूर भागे तो वे उसे वापिस खींच लाएंगे और यदि कोई इससे पीछे कदम खींचे तो वे उसे धक्का दे देंगे। अल्लाह – जिसकी महिमा अपरंपार है – (हदीसे कुदसी में, अर्थात वह कथन जो स्वयं अल्लाह के हैं) कहता हैः ‘‘मैं अपने आप की कसम खाता हूं कि मैं उनकी तरफ बुराई को भेजूंगा कि वे हैरत में पड़ जाएंगे’’ और वह ऐसा करेगा। हम अल्लाह की उपेक्षा के कारण ठोकरें खाने से क्षमा चाहते हैं।’’

मौहम्मद अलवी, ईश्वर की राह का एक छोटा सा छात्र

 

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