कांग्रेस राज में अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय की दुखद दुर्दशा

MOMA_Imageनाम में ही तो सब कुछ रखा है; ‘मदरसा’ बोलो तो ‘हां’, अंग्रेजी में ‘सेमिनेरी’ बोलो तो ‘न’

आर एन आई, नई दिल्लीः

दारूल उलूम नदवतुल उलेमा देश के प्रमुख इस्लामी मदरसों में से एक है। भारत की आजादी से बहुत पहले से यह मदरसा सव्र्वोच्च क्रम की धार्मिक शिक्षा प्रदान करता आया है। धार्मिक शिक्षा की खोज में छात्र विश्व के कोने कोने से यहां आते हैं। यह सामान्य ज्ञान की बात है कि शब्द ‘मदरसा’ का अंग्रेजी अनुवाद करेंगे तो ‘सेमिनेरी’ होता है। इंटरनेट पर कई स्थानों पर दारूल उलूम नदवतुल उलेमा के लिए ‘सेमिनेरी’ शब्द का प्रयोग हुआ है। गूगल शब्दकोश भी शब्द ‘सेमिनेरी’ का हिन्दी और उर्दू दोनों में अनुवाद ‘मदरसा’ करता है।

इसके बावजूद अधिक संभावना है कि यदि मौलाना सैयद राबे अल-हसन नदवी, जो देश के प्रसिद्ध इस्लामी विद्वान हैं और नदवतुल उलेमा के रेक्टर हैं, अपने मदरसे का अल्पसंख्यक शिक्षा संस्थान के प्रामाणीकरण के लिए इसी हेतु बनाई गई सरकारी संस्था एनसीएमईआई (NCMEI – National Commission for Minority Educational Institutions) में आवेदन देते हैं तो उनका आवेदन इस लिए रद्द कर दिया जाएगा कि दारूल उलूम नदवतुल उलेमा के नाम में शब्द ‘मदरसा’ नहीं आता। अल्पसंख्यक मामले के लिए जिम्मेदार मंत्रालय की यह दुखद दुर्दशा है। और यही कुछ कारण हैं कि कांग्रेस, हर मंच पर अल्पसंख्यकों की हालत के लिए चिंता जताने के बावजूद, आज तक अल्पसंख्यकों का विश्वास नहीं प्राप्त कर पाई है।

हाल ही में प्रकाश में आए एक मामले में अल्पसंख्यक समुदाय से संबंधित संस्थानों को अल्पसंख्यक दर्जा प्रमाणपत्र देने के लिए जिम्मेदार एनसीएमईआई ने 21 वर्षों से चल रहे मदरसे जिसका नाम युनिटी माडर्न सेमिनेरी है को अल्पसंख्यक दर्जा प्रमाणपत्र देने के लिए इस बुनियाद पर मना कर दिया क्योंकि उसके नाम में अंग्रेजी में शब्द ‘सेमिनेरी’ है न कि उर्दू में शब्द ‘मदरसा’। नाम में शब्द ‘मदरसा’ होना आवश्यक है यदि आप मदरसे के लिए आवेदन भर रहे हैं, एक अधिकारी ने क्हा। आर एन आई ने इस मामले को अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री के. रहमान खां तक, उनके निजी सचिव बदरूद्दीन के माध्यम से, पहुंचाने की कोशिश की परन्तु एनसीएमईआई की ही तर्ज पर मंत्रालय के आला हुक्काम भी कान बंद किए नज़र आए।

विवादित मदरसे के एक प्रवक्ता ने क्हाः ‘‘एनसीएमईआई के एक सदस्य श्री जफर आगा ने हमसे साफ शब्दों में कहा कि हमारी संस्था को अल्पसंख्यक संस्था प्रमाणपत्र इसलिए नहीं दिया जा सकता क्योंकि हमारे नाम में शब्द ‘मदरसा’ नहीं आता। इससे पहले यही तर्क देते हुए एनसीएमईआई के अध्यक्ष न्यायमूर्ती एमएसए सिद्दीकी ने हमारे सामने केवल दो विकल्प छोड़े, कि या तो हम आवेदन वापस ले लें या वह इसको अस्वीकार कर देंगे। उन्होंने क्हा कि यदि हमारा आवेदन खारिज कर दिया जाता है तो फिर संस्था फिर कभी आवेदन नहीं कर सकेगी। हमारे पास आवेदन वापिस लेने के अतिरिक्त कोई रास्ता नहीं था।’’

तत्पश्चात आर एन आई ने श्री जफर आगा से इस संबंध में बात की तो उन्होंने दोहराया कि अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय द्वारा एनसीएमईआई को जारी किए गए दिशा निर्देशनों के अनुसार यदि किसी मदरसे को अल्पसंख्यक संस्था प्रमाणपत्र चाहिए तो उसके नाम में शब्द ‘मदरसा’ होना अनिवार्य है। श्री जफर आगा ने मदरसा चलाने वालों की आलोचना करते हुए क्हा कि यदि उनका बस चले तो देश के तमाम मदरसे बंद करा दें। उन्होंने क्हा कि वह अपने लेखों के माध्यम से अनेक बार यह कहते आए हैं।

आर एन आई ने डाक्टर हुसैन से बात की जो करीब चार दशक पुरानी गैर लाभकारी संगठन सोशल वर्कर्स एसोसिएशन से संबंधित हैं और सार्थक शिक्षा के अतिरिक्त अल्पसंख्यक और समाज कल्याण से संबंधित अन्य गतिविधियों में कार्यरत हैं। डाक्टर हुसैन ने क्हाः ‘‘अनेक अल्पसंख्यक मदरसे हैं जिनके नाम में शब्द ‘मदरसा’ नहीं आता। अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्व इस्लामी विद्वान, शिक्षाविद एवं सुधारक डाक्टर कल्बे सादिक ने अलीगढ़ में एक आधुनिक मदरसे की बुनियाद डाली थी जिसका नाम मदीनतुल उलूम सेमिनेरी था। यह तर्क अन्य शैषिक संस्थानों में भी नहीं लागू है। कितने ही स्कूल हैं जिनके नाम में शब्द ‘स्कूल’ नहीं आता। एम ए एफ अकैडमी या शिशु विद्यानिकेतन इसके उदाहरण हैं। इसी प्रकार विश्वविद्यालय हैं जिनके नाम में शब्द ‘विश्वविद्यालय’ नहीं आता। काशी विद्यापीठ और जामिया मिल्लिया इस्लामिया केवल दो उदाहरण हैं। यदि एक संस्था जो मानव संसाधन मंत्रालय के एनआईओएस से भी मदरसे के रूप में अधिकृत है को केवल इस आधार पर अल्पसंख्यक संस्था प्रमाणपत्र नहीं मिलता कि उसके नाम में शब्द ‘मदरसा’ नहीं आता तो यह अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय और सत्तासीन पार्टी की दोहरी नीतियों को दर्शाता है।

अपना नाम सामने न लाने की शर्त पर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से संबंधित एक शिक्षाविद कहते हैंः ‘‘अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय का गठन केवल अल्पसंख्यकों को प्रसन्न करने के लिए किया गया है न कि काम करने के वास्वविक इरादे से। यही कारण है कि अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय ने अपनी पांच वर्षीय कारगुजारी रिपोर्ट को चुनाव होने तक सार्वजनिक करने से रोक लिया हालांकि यह रिपोर्ट प्रकाशित हो चुकी है। यह कांग्रेस की पालिसी है कि वह ऐसे प्रावधान शामिल कर देती है कि अल्पसंख्यक लाभ ले सकने से वंचित रह जाएं। यदि अल्पसंख्यक मामलों का मंत्रालय एक ऐसे व्यक्ति जो अपने लेखों में मदरसों की आलोचना करता आया है को एनसीएमईआई का सदस्य बनाता है जहां मदरसे भी अल्पसंख्यक संस्था प्रमाणपत्र के लिए आवेदन देते हैं तो इस में कोई शक नहीं रह जाता कि कांग्रेस जमीनी सतह पर कोई लाभ प्रदान करने को लेकर गंभीर नहीं है।’’

रियल न्यूज इंटरनेश्नल न्यूज ब्यूरो

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