पन्द्रह रूप्ये का खाना, दस रूपये में शौच

Inside of the 'Deluxe Toilet'

Inside of the ‘Deluxe Toilet’

सक्षम परन्तु नये रेलवे मंत्री के लिए एजेंडा

अजीज हैदर/आरएनआई न्यूजः

एक प्रसिद्ध कहावत हैः अंधेर नगरी चैपट राजा, टके सेर भाजी टके सेर खाजा। इसको ऐसे समझाया जा सकता है कि एक अकुशल प्रशासन में सभी वस्तुएं, भले ही कीमती हों या सांसारिक, सब एक ही दाम बिकती हैं। इसका दूसरा अर्थ यह होगा कि अच्छे और बुरे, सच्चे और झूठे, दयालु और निदर्यी आदि में कोई अन्तर नहीं रह जाता।

इसी से कुछ मिलता जुलता उदाहरण पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन पर देखने को मिलता है जहां जनता के लिए भोजन पन्द्रह रूप्ये में उपलब्ध है परन्तु घटिया तेल में बनी पूरी सब्जी खाने के बाद यदि आपको शौचालय जाने की आवश्यकता हो तो उसके लिए आपको दस रूपये देने होंगे।

Inside picture of the 'Deluxe toilet'

Inside picture of the ‘Deluxe toilet’

हम इस समस्या को सामने इस कारणवश ला रहे हैं क्योंकि जनता को नये रेल मंत्री डी वी सदानंद गौड़ा से बड़ी आशाएं हैं; उन्हें एक सक्षम और वादे निभाने वाले व्यक्ति के रूप में देखा जाता है। दूसरी ओर, चुनाव मुहिम के दौरान एक सकारात्मक बदलाव के लिए नेरंद्र मोदी से राष्ट्र की उम्मीदें चरमोत्कर्ष पर हैं। इसके अतिरिक्त गोरखधाम ट्रेन दुर्घटना के पश्चात, जो ठीक उसी दिन हुई जब नये मंत्री के रूप में वह शपथ ग्रहण कर रहे थे, सदानंद गौड़ा ने क्हा था कि उन्हें जनता के सामने आकर भविष्य के रोडमैप को पेश करने के लिए दस दिन का समय चाहिए।

सुरक्षा, नई उपनगरीय ट्रेनों की शुरूआत, चुनिंदा जगहों पर अतिरिक्त शाखा लाईनों का निर्माण, बेहतर रेलवे नेटवर्क और बेहतर गति आदि को अक्सर रेलवे के सामने उद्धृत समस्याओं के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। परन्तु जमीनी स्तर पर बड़ा बदलाव आ जाएगा यदि आम आदमी की छोटी छोटी समस्याओं का निवारण कर दिया जाए। यदि बिचैलियों और दलालों को समाप्त कर दिया जाए, जो विशेष रूप से छोटे शहरों के हर विभाग में आसन जमाए बैठे हैं, तो यह एक बड़ा कदम होगा।

Inside picture of the 'Deluxe Toilet'

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यहां हम पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन की बात कर रहे हैं जहां से समूचे उत्तर और पूर्वी भारत के लिए ट्रेनें मिलती हैं। पाकिस्तान के लिए प्रसिद्ध ट्रेन – समझौता एक्सप्रेस – भी यहीं से शुरू और समाप्त होती है। स्टेशन पर उप्लब्ध जनता भोजन में मिलने वाली पूड़ी सब्जी का पन्द्रह रूप्ये मूल्य तय किया गया है। यही पूड़ी सब्जी संसद भवन में अधिक सस्ती मिल सकती है। संसद भवन में टायलट उपयोग के लिए कोई कीमत नहीं देनी पड़ती परन्तु यदि आप को पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन पर शौच की आवश्यकता हो जाए तो सार्वजनिक उपयोगिता के लिए चल रहे ‘डीलक्स टायलट’ को एक बार प्रयोग करने के लिए आप को दस रूपये देने होंगे। इस ‘डीलक्स टायलट’ के अन्दर की हालत ऐसी है कि हमारे अधिकतर पाठक इसका प्रयोग करने की सोचेंगे भी नहीं। इस शौचालय के अन्दर की दयनीय हालत को पेश करने के लिए आरएनआई को फोटो का सहारा लेना पड़ा।

‘डीलक्स शौचालय’ में दस दस रूपये का संग्रह कर रहे एक कर्मचारी ने बताया कि ‘‘यह सुलभ टायलट नहीं है जिसको गैर सरकारी संगठन होने के कारण सरकार द्वारा सहायता मिलती है। यह टायलट एक निजी कंपनी चला रही है और इसलिए रेट अधिक है। हमको रोजाना 3500 रूपये कंपनी को देना होते हैं। सफाई कर्मचारी भी अच्छी खासी रकम ले लेता है। इसके बाद हमें स्वयं के पेट भरने के लिए अर्जित करना होता है।’’

Coupon for one time use of toilet

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मुद्दा यह नहीं है! असली मुद्दा यह है कि पब्लिक प्राईवेट पार्टनरशिप के नाम पर दिए जाने वाले लाभ से केवल अमीरों को अधिक लाभ हुआ जो और अधिक अमीर होते जा रहे हैं जब्कि गरीब की हालत ज्यों की त्यों रही। उसको मिलने वाला वेतन पहले से कम हो गया और वह अपनी नौकरी बचाए रखने के लिए नियोक्ताओं की दया दृष्टि का मोहताज हो गया। जो पक्की नौकरी वह किया करते थे वह भी समाप्त हो गई। सरकार ने भले ही इस स्तर पर कर्मचारी प्रबंधन “manpower management” से अपने आप को मुक्त कर लिया हो, लेकिन अपदस्थ कांग्रेस सरकार ने पब्लिक प्राईवेट पार्टनरशिप के नाम पर जो मिडिलमैन खड़े किए हैं उनके रहते जमीनी स्तर पर काम कर रहे लोगों को इन स्कीमों का लाभ नहीं पहुंच रहा। यही प्रणाली लगभग हर जगह और हर मंत्रालय में काम करती देखी जा सकती है।

Train coach without window panes in toilet

Train coach without window panes in toilet

समाधान जनता भोजन की कीमत में वृद्धि करना नहीं है! समाधान केवल यह भी नहीं है कि जो पैसा वसूला जा रहा है वह कम कर दिया जाए क्योंकि इसकी मार नीचे काम कर रहे केवल उस व्यक्ति पर पड़ेगी जो किसी तरह शौचालय को चला रहा है। समाधान यह है कि टायलेट को उस नीचे स्तर पर काम कर रहे व्यक्ति को ही चलाने हेतु दे दिया जाए जो कुछ बारसूख लोगों को 3500 रूपये रोजाना केवल इसलिए दे रहा है कि उन्होंने एक कंपनी बना कर टायलट चलाने का ठेका अपने नाम ले रखा है।

‘‘यदि आप स्टेशन पर ही हैं तो किसी ट्रेन के टायलट का प्रयोग करें जिसके इस्तेमाल के लिए कुछ कीमत अदा नहीं करना पड़ती,’’ अधिक सकारात्मक सोच वाले व्यक्ति कुछ ऐसा समाधान सामने रख सकते हैं। यह सफर करने वाले यात्रियों के लिए व्यवहार्य विकल्प हो सकता था यदि आम आदमी के लिए चल रही ट्रेनों के शौचालयों की खिड़की में शीशे लगे होते। आरएनआई ने पाया कि हल्द्वानी जाने वाली पैसेंजर ट्रेन के अधिकांश डिब्बों के टायलट में शीशे ही नहीं थे जो बाहर से अन्दर की ओर देखने वालों से आप को बचा सकें। आप कह सकते हैं कि इन टेनों में यात्रा करने वाले यात्री शिकायत ही नहीं करते और यदि करते हैं तो उनकी कोई सुनवाई नहीं।

Train coach without window panes in toilet

Train coach without window panes in toilet

लेकिन देखने में आया है कि अतीत में बहुतेरे लोगों की शिकायतें भी बहरे कानों पर पड़ीं। सोशल वर्कर्स एसोसिएशन के एस एम हैदर बताते हैं कि उनकी संस्था रेलवे के कामकाज से जुड़े कई मुद्दों की शिकायत करती आई है। ‘‘हम ने बहुतेरे मुद्दों को उठाने की कोशिश की पर अधिकांश मामलों में कोई सुनवाई नहीं हुई। हम ने रेलवे को लिखा कि वृद्ध, कमजोर और विकलांग व्यक्तियों के लिए ट्रेन में चढ़ने उतरने में बड़ा कष्ट होता है क्योंकि प्लेटफार्मों और ट्रेन के स्तर में बहुत अन्तर है। मेट्रों प्लेटफार्मों के समान ट्रेन और प्लेटफार्म का स्तर एक होना चाहिए। इससे न केवल यात्रियों की कठिनाई बड़े पैमाने पर दूर हो जाएगी बल्कि दुर्घटनाओं में भी कमी आएगी। हम ने यह भी लिखा कि प्लेटफार्म और रेलवे ट्रैक के दरमियान असमान दूरी भी दुर्घटनाओं का कारण बनती है क्योंकि कई स्थान ऐसे हैं जहां यह दूरी बहुत अधिक है। परन्तु कोई उत्तर नहीं मिला और न ही कोई कार्यवाही हुई। हम राजधानी और शताब्दी एकस्प्रेस में पड़ौसे जा रहे खाने की गुणवत्ता के बारे में भी शिकायत करते आए हैं। हम ने यह भी शिकायत की कि खाद्य सामग्री बनाने वाली कुछ कंपनियां रेलवे प्लेटफार्मों के लिए विशेष पैकिंग करती हैं जिनपर या तो कीमत अधिक दर्ज होती है या मात्रा कम होती है। ऐसा शायद इसलिए होता है क्योंकि आईआरसीटीसी द्वारा खरीद में अधिक कमिशन देना होता है। परन्तु हमारी शिकायतें बहरे कानों तक गईं।’’

आर एन आई न्यूज नेटवर्क

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