मध्य पूर्व में दाएश जैसे संगठनों के दुष्कर्म को सुन्नी शिया लड़ाई के रूप में प्रस्तुत करना इस्रायली साजिश का भागः ईरानी राजदूत

IraniAmbassadorAddressingThePressMeet-1आर एन आई, नई दिल्लीः

इस्रायल मध्य पूर्व देशों को कमजोर करने और वहां की जनता को विभाजित करने में बड़े दिनों से लगा रहा है। बड़े समय से उसकी कोशिश रही है कि इस क्षेत्र के मुसलमानों के बीच सांप्रदायिक तनाव पैदा कर और उसे बढ़ावा देकर उनकी शक्ति को कमजोर कर दे। हाल के दिनों में दाएश जैसी उग्रवादी संगठनों की इराक में लड़ाई और उसके विरूद्ध ईराकी जनता की संयुक्त कारवाई को भी यह शक्तियां सुन्नी शिया लड़ाई के रूप में प्रस्तुत करने में लगी हैं। भारत में ईरानी राजदूत गुलाम रजा अंसारी ने पत्रकारों से एक विशेष बातचीत में आज इन विचारों को रखा। ईरानी दूतावास में मिशन के उपप्रमुख हसन शुजा भी इस मौके पर मौजूद थे।

दाएश और आईएसआईएल जैसी संगठनों की खुले शब्दों में आलोचना करते हुए अंसारी ने क्हा कि इनका मानवता से कोई नाता नहीं है। इस लड़ाई को सुन्नी शिया लड़ाई के रूप में प्रस्तुत करके यह संगठन ईराक में कदम जमाना चाहती है। उन्होंने क्हा कि सीरिया में हुए चुनाव की सफलता के बाद, जिसमें वहां की जनता ने बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेकर बशर अल-असद के प्रति अपने समर्थन को साबित किया दाएश और वहां लड़ रही दूसरी आतंकवादी संगठनों पर बेहद दबाव था। सीरिया में भी उन्होंने इस लड़ाई को साम्प्रदायिक रंग देने की कोशिश की परन्तु सफल नहीं हुए और वहां की जनता ने उनकी सहायता करने के स्थान सीरियाई फौज की सहायता करना अपने पक्ष में बेहतर समझा, जिसके परिणामस्वरूप उन्हें सीरिया में वह सफलता नहीं मिल सकी जिसका वे स्वपन देख रहे थे। अन्तः उन्होंने ईराक का रूख किया और सद्दाम हुसैन की बाथ पार्टी के कुछ सदस्यों के साथ मिलकर ईराक के कुछ हिस्सों पर कब्जा जमा लिया। जब यह पूछा गया कि इतनी बड़ी संख्या में अस्लहों से लैस लोग ईराक में कैसे आ गए और वहां किसी को पता भी नहीं लगा, अंसारी ने माना कि कुछ अन्य क्षेत्रीय देशों की सहायता के बिना यह संभव नहीं हो सकता।

सीरिया में हुए सफल चुनाव की चर्चा करते हुए ईरानी राजदूत ने क्हा कि अमरीका और अन्य पश्चिमी देश सीरिया में जारी संघर्ष को सुन्नी शिया लड़ाई के रूप में पेश कर रहे थे परन्तु 60 प्रतिशत से अधिक जनता ने बशार अल-असद की हिमायत में वोट देकर उनके प्रचार को गलत साबित कर दिया। उन्होंने क्हा कि ईरान शुरू से कहता आया है कि सीरिया की समस्या का केवल राजनीतिक समाधान ही निकल सकता है। अमरीका को भी अब महसूस हो रहा है कि सीरिया के खिलाफ लड़ रहे लोगों को जो सहायता वे प्रदान कर रहे थे वह घूम फिर कर अंततः दाएश और उस जैसी अन्य संगठनों को पहुंची जिसका परिणाम आज सब के सामने है। उन्होंने बताया कि हाल में हुए एक सर्वेक्षण के अनुसार सीरिया के पुननिर्माण और फिर उसे उस मकाम तक पहुंचाने जहां वह आज से तीन साल पूर्व था के लिए करीब दो सौ डालर की आवश्यकता होगी। इससे साफ हो जाता है कि अमरीका और उसके सहयोगियों ने सीरिया में आतंकवादियों को सहायता पहुंचा कर सीरिया को उसकी तीन वर्ष पहले की स्थिति से पचास वर्ष पीछे ढकेल दिया।IraniAmbassadorAddressingThePressMeet-2

अंसारी ने क्हा कि यही कारण है कि ईरान का हमेशा यह रूख रहा है कि जो भी बातचीत की जाए वह उस देश की सरकार से की जाए। लीबिया के सम्बंध में बोलते हुए उन्होंने क्हा कि ईरान लीबिया में सैन्य कारवाई के खिलाफ था। आज लीबिया की बदहाली की खबर लेने वाला कोई नहीं है, उन्होंने क्हा। इसी प्रकार मिस्र को भी अपने पैरों पर खड़ा होने में बड़ा समय लगेगा।

ईराक को ईरान द्वारा सैन्य सहायता देने के प्रश्न पर अंसारी ने क्हा कि ईरान का पहले दिन से रूख रहा है कि यदि ईराकी सरकार हमसे किसी प्रकार की सहायता मांगती है तो सहायता देने के लिए तैयार हैं। परन्तु ईराक के सुन्नी और शिया उलेमा के फतवों के बाद ईराक के ही कई लाख युवा सेना को स्वैच्छिक समर्थन देने के लिए तैयार हैं। इस लिए हमें नहीं लगता कि ईराक में किसी बाहरी देश को हस्तक्षेप करने की आवश्यकता है। उन्होंने क्हा कि हम अमरीका या किसी अन्य देश के ईराक के अन्द्रूनी मामलात में हस्तक्षेप किए जाने के समर्थन में नहीं हैं।

सउदी अरब के बारे में पूछे गए एक प्रश्न का उत्तर देते हुए ईरानी राजदूत ने क्हा कि सउदी अरब क्षेत्र के प्रमुख देशों में से है। हम चाहते हैं कि ईरान और सउदी अरब के सम्बंध बेहतर हों। हमारे बेहतर सम्बंध समूचे मध्य पूर्व में सकारात्मक असर डालेंगे, उन्होंने क्हा।

आर एन आई न्यूज ब्यूरो

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