“स्वतंत्र भारत के इतिहास में सबसे बड़े धोकों में से एक”

NAJMA-BIGयह ऐसा मुद्दा है जो न केवल संसद बल्कि समूचे देश को हिला देने की क्षमता रखता है।यह वर्षों से सुलग रहा है और यदि आग नहीं पकड़ पाया तो केवल इसलिए क्योंकि न ही कांग्रेस न भाजपा चाहती है कि यह तूल पकड़े। लेकिन कुछ लोगों ने ठानी है कि इस मुद्दे पर इंसाफ प्राप्त कर के रहेंगे।यह हैं मशहूर अधिवक्ता प्रशांत भूषण, मौलाना अबुल कलाम आजाद के दत्तक पुत्र के पुत्र और लेखक फीरोज बख्त अहमद और पूर्व में आई सी सी आर से संबंधित रहे मधूप मोहता। इनका मानना है कि समय आ गया है कि इंसाफ हो और ‘‘स्वतंत्र भारत के इतिहास में सबसे बड़े धोकों में एक जिसका कवर-अप किया गया’’ के अपंराधियों को अदालत में खींच लाया जाए।

मोहता का मानना है कि ‘‘इस मुद्दे का कवर-अप और सुभाष चंद्र बोस और लाल बहादुर शास्त्री की मौत के कारणों का कवर-अप वह गंभीर मुद्दे हैं जो दर्शाते हैं कि कैसे कुछ चुनिंदा व्यक्ति भारतीय संघ को और एक के बाद एक सरकारें जनता को बेवकूफ बनाने की साजिश करते रहे। किसी समय आईसीसीआर से जुड़े रहे मधूप मोहता ने सबसे पहले उजागर किया था कि भाजपा की ओर से पूर्व उपराष्ट्रपति की उम्मीदवार और वर्तमान एनडीए सरकार में अल्पसंख्यक मामलों की मंत्री नजमा हेपतुल्ला ने अपनी पुस्तक में मौलाना अबुल कलाम आजाद के साथ अपनी निकटता और संबंध दिखाने के लिए दो फोटो को जोड़कर एक फोटो बनाने का गुनाह किया था जिसको आईसीसीआर ने प्रकाशित किया था। तस्वीर को मौर्फ करने का मामला जब मीडिया में उछला और उस पर एफआईआर,  जनहित याचिका और सीबीआई जांच हुई तो मोहता को ही दोषियों में से एक मानते हुए कार्यवाही हुई और नजमा हेप्तुल्ला किसी भी कार्यवाही से बची रह गईं।

‘‘कानून के लंबे हाथ अभी तक उन तक नहीं पहुंचे क्यों कि वह विभिन्न सत्तासीन सरकारों से अच्छे संबंध बनाए रहीं,’’ फीरोज बख्त अहमद कहते हैं। उन्हें अफसोस है कि हालांकि वह मौलाना आजाद से निकटतम संबंध रखते हैं,  इसके बावजूद नजमा अपने आपको मौलाना आजाद के एकमात्र जीवित रिश्तेदार के रूप में प्रस्तुत करती रहीं। फीरोज बख्त तो यहां तक कहते हैं कि  ’’नजमा का मौलाना आजाद से दूर दूर तक कोई रिश्ता नहीं है।’’

मोहता बताते हैंः ‘‘मौलाना आजाद का कोई वंशज नहीं था। वह अपने बड़े भाई के पुत्र नूरूद्दीन को अपने पुत्र के समान चाहते थे। नूरूद्दीन जिस युवती से विवाह करना चाहते थे वह आयु में उनसे बहुत छोटी थी। नूरूद्दीन ने विवाह का न्योता भेजा तो युवती ने यही कहते हुए मना कर दिया। नूरूद्दीन ने युवती की मां को पत्र लिखा कि वह उनके जैसे प्रतिष्ठित परिवार से आए रिश्ते को ठुकरा रही हैं। युवती की मां ने अपनी बड़ी पुत्री को नूरूद्दीन से विवाह करने को तैयार किया। फीरोज बख्त अहमद का जन्म इसी विवाह के फलस्वरूप हुआ। परन्तु विवाह के बावजूद नूरूद्दीन ने ठीक तरीके से अपने परिवार को नहीं पहचनवाया।’’

The issue was raised earlier but despite court case, FIR and CBI inquiry, died down with time

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मोहता आरोप लगाते हैं कि धीरे धीरे नजमा हेपतुल्ला ने अपने आप को मौलाना आजाद की एकमात्र जीवित संबंधी के रूप में प्रस्तुत करना आरंभ कर दिया। वह दावा करते हैं कि इंदिरा गांधी के नेतृत्व में तत्कालीन कांग्रेस सरकार की भी इस धोके को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका रही। मौलाना आजाद की आत्मकथा के अंतिम 30 पन्नों को 1988 तक गुप्त रखा गया था। इंदिरा गांधी आशंकित थीं कि इन पृष्ठों में जवाहरलाल नेहरू और भारत की आजादी में उनकी भूमिका को आम धारणा से अलग ढंग से चित्रित किया गया हो सकता है। इसलिए, मोहता कहते हैं,  यह मिथक कि नजमा मौलाना आजाद की एकमात्र जीवित रिश्तेदार हैं के निमार्ण के पीछे निहित कारण थे।

नजमा को मौलाना आजाद की एकमात्र जीवित रिश्तेदार के रूप में प्रस्तुत करने के कारण अंततः अभियोजक ने मौलाना आजाद की आत्मकथा के अंतिम 30 पृष्ठों को नजमा के हवाले कर दिया, जिसको नजमा ने प्रकाशित किया। इन प्रकाशित पृष्ठों में हमने जो कुछ पढ़ा वह जनता की उस धारणा के विपरीत था जो उन 30 पृष्ठों के साथ बरती गई गोपनीयता और इस कारणवश मिले प्रोमोशन के कारण उसने बना रखी थी। इन 30 पृष्ठों में कुछ भी ऐसा नहीं मिला जो उनको इतने वर्ष गुप्त रखने का कारण हो सकता है।

मोहता कहते हैं कि जब सोनिया गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस को नजमा के मौलाना आजाद के साथ बनाए गए इस जाली रिश्ते का पता चला तो उसने नजमा को फिर से राज्यसभा में मनोनीत न करने का फैसला लिया। नजमा ने भाजपा का रूख किया जिसने न केवल उनका स्वागत किया बल्कि एक समय डाक्टर कर्ण सिंह को राष्ट्रपति और नजमा को उपराष्ट्रपति बनाने का भी मन बना लिया था। यही वह समय था जब आईसीसीआर ने नजमा की वह पुस्तक प्रकाशित की जिसमें उन के मौलाना आजाद से करीबी रिश्तों का बखान किया गया था। आरोप है कि इस पुस्तक में नजमा और मौलाना आजाद की एक मौर्फ की गई फोटो थी

मोहता कहते हैं कि जांच पर जब पता चला कि फोटो मौर्फ हो सकती है तो उन्होंने उस पुस्तक के मुद्रक को तलब किया जिसने नजमा के कहने पर दो फोटो को मौर्फ कर के एक फोटो बनाने की बात को कबूल किया। पुस्तक को आईसीसीआर ने वापस ले लिया और उस फोटो को बदल कर पुनः प्रकाशित किया। फीरोज बख्त का कहना है कि आज भी पुस्तक का वह पहला संस्करण उनके पास उप्लब्ध है जिसमें मौर्फ फोटो का प्रयोग किया गया था।

फीरोज बख्त बताते हैंः मौलाना आजाद की शाह ईरान के साथ एक फोटो थी जिसमें दोनों सोफे पर विराजमान थे। एक अन्य फोटो में नजमा हेपतुल्ला कुछ अन्य लोगों के साथ सोफे पर बैठी थीं। शाह ईरान को फोटो से हटाकर उसकी जगह नजमा की फोटो लगाई गई ताकि मौलाना आजाद के साथ नजमा को सोफे पर बैठा दिखाया जा सके।

कुछ लोग फोटो मौर्फ करने की इस घटना को, यदि यह सही है,  भले ही छोटा मानें परन्तु फीरोज बख्त ने अदालत में एक याचिका डाली है जिसमें सुनवाई के लिए अगले माह की तारीख मिली है। प्रख्तात अधिवक्ता प्रशांत भूषण फीरोज बख्त की ओर से अदालत में पेश होंगे। फीरोज बख्त का दावा है कि वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को तमाम हालात से अवगत करा चुके हैं। भूषण सीबीआई का एक विशेष जांच दल गठित किए जाने की मांग कर रहे हैं। फीरोज बख्त का मानना है कि उनका केस मजबूत है और कहते हैं कि यदि ‘प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी नजमा को बचाना चाहें तो नहीं बचा सकते।’ वह कहते है,  ‘‘जब सीबीआई जांच शुरू करेगी तो पिछले 60 वर्षों में किया गया कवर-अप खुलकर सामने आएगा।’’

असली मुद्दा, मोहता बताते हैं, यह है कि समूचा तंत्र भारत सरकार को बेवकूफ बनाता रहा है और कई बार उच्च स्थानों पर बैठे लोग देश को बेवकूफ बनाते रहे हैं। मामला आदरणीय अदालत में है जो आने वाले समय में अपना फैसला सुनाएगी। भूषण के इस केस में पड़ने से लगता है कि अधिकारी यदि चाहें भी तो उनके लिए केस को एक बार फिर दबा देना आसान नहीं होगा।

रियल न्यूज इंटरनेश्नल (आरएनआई), नई दिल्ली

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