‘‘सरकार आत्मविश्लेषण करे उन बच्चों को लेकर जिन का आज भी स्कूल में दाखिला नहीं हो पाता’’ः अशोक कुमार पाण्डेय

Ashok Kr. Pandey, Principal-Ahlcon International School, Delhi

Ashok Kr. Pandey, Principal-Ahlcon International School, Delhi

आर एन आई, नई दिल्लीः

ऐसे समय में जबकि दिल्ली के निजी स्कूल उच्च न्यायालय खंडपीठ के आदेश के पश्चात नर्सरी में प्रवेश खोलने के लिए कमर कस रहे थे और ऐसा समझा जा रहा था कि शिक्षा विभाग और दिल्ली के स्कूलों के बीच चल रहे विवाद का हल निकल आया है, शिक्षा निदेशालय की ओर से निजी स्कूलों को मिले नये निर्देश ने जिसमें प्रवेश प्र्रिक्रया को उस समय तक प्रांरंभ न करने को कहा गया है जब तक उच्चतम न्यायालय का फैसला न मिल जाये इस विवाद को फिर से तूल दे दिया है। शिक्षा निदेशालय को अधिकार है कि वह उच्चतम न्यायालय से गुहार लगाए परन्तु जब तक वह ऐसा नहीं करता निजि स्कूलों को प्रवेश प्र्रिक्रया जारी रखने से रोकने के आदेश को उच्च न्यायालय खंडपीठ के निर्देश के उल्लंघन के रूप में देखा जा रहा है।

उच्च न्यायालय खंडपीठ से मिले आदेश के पश्चात निजी स्कूलों की शीर्ष एसोसिएशन ‘एक्शन कमेटी’ एवं अन्य संघ जैसे नेश्नल प्रोग्रेसिव स्कूल कांफ्रेंस नर्सरी में प्रवेश के दिशा निर्देश तैयार करने में लगे हैं। ऐसे में शिक्षा निदेशालय ने स्कूलों को आदेश दिये हैं कि वह उस समय तक दाखिलों की प्र्रिक्रया प्ररंभ न करे जब तक उच्चतम न्यायालय से इस संदर्भ में कोई निर्णय प्राप्त न हो जाए। गौरतलब है कि उच्चतम न्यायालय सर्दियों की छुट्टियों के पश्चात 5 जनवरी को खुलेगा। शिक्षा निदेशलय से मिले नये निर्देशों के पश्चात निजि स्कूल इतने दिनों तक दाखिले प्रारंभ नहीं कर पाएंगे।

ऐसा प्रतीत होता है कि शिक्षा निदेशालय ने पिछले वर्ष के हालात से कोई सबक नहीं सीखा जब प्रवेश प्र्रिक्रया को अपने नियंत्रण में करने के उसके प्रयास के चलते मई में दाखिले प्रारंभ हो पाये थे और जूलाई से ही शिक्षा प्रारंभ हो पाई थी।

दिल्ली के प्रख्यात अहलकान इंटरनेश्नल स्कूल के प्रधानध्यक्ष अशोक कुमार पाण्डेय जो दिल्ली सरकार की सलाहकार समिति के सदस्य भी हैं का कहना हैः ‘‘लगभग चार लाख छात्रों ने पिछले वर्ष नर्सरी में दाखिले के लिए आवेदन किए थे। जिसमें से सारे निजी स्कूल संयुक्त रूप से केवल 1 लाख छात्रों को समायोजित कर पाए थे। शेष तीन लाख छात्रों को या तो गैर मान्यता प्राप्त स्कूलों में दाखिला लेना पड़ा या शहर से बाहर जाना पड़ा। अन्य बहुतेरों ने अंततः सरकारी स्कूलों में दाखिला लिया जिन की हालत अब तक निदेशालय सुधार करने में असमर्थ रहा है। शेष तीन लाख छात्रों की कठिनाईयों को अनदेखा कर शिक्षा निदेशालय निजी स्कूलों की स्वायत्ता लेने पर उत्सुक है जो बड़ी संख्या में बच्चों को अच्छी शिक्षा प्रदान कर रहे हैं।’’

पूरे मामले की जानकारी देते हुए पाण्डे कहते हैंः ‘‘पिछले वर्ष सरकार ने एक अधिसूचना जारी की जिस को स्कूलों ने संविधान द्वारा उन्हें दी गई स्वायत्ता का उल्लंघन महसूस किया। पर यह अस्ली मुद्दा नहीं था। अस्ली मुद्दा यह था कि यह दिशानिृर्देश छात्रों और उनके माता-पिता के हित में नहीं थे। पहले दिशानिर्देश के अनुसार शून्य से 8 किलोमीटर तक रहने वाले दाखिले के इच्छुक सब छात्रों को बराबर अंक मिलने थे। दूसरा विवादास्पद मुद्दा हस्तांतरण से संबंधित मामलों में उचित परिभाषा का अभाव था। यदि किसी को महाराष्ट्र से गुजरात स्थानांत्रित किया जा रहा था और उसके परिवार का कोई सदस्य दिल्ली में था वह भी स्थानांत्रण के अंकों का दावेदार बनकर अदालत चला गया। इन मुद्दों को अदालत में चुनौती दी गई जिसके चलते दाखिले की प्र्रिक्रया में 5-6 महिने की देरी हुई। मई में स्कूल दाखिले की सूची जारी कर पाए और जुलाई में कक्षाएं प्रारंभ हो सकीं।’’

पाण्डे आगे कहते हैंः ‘‘पिछले वर्ष से यह मुद्दा अदालत के समक्ष विचाराधीन था। 28 नवंबर के अपने फैसले में न्यायालय ने हमारी सभी मांगों को उचित करार देते हुए फैसला सुनाया।’’

उच्च न्यायालय की खंडपीठ के नवीनतम आदेश के बाद जिसमें अदालत ने निजी स्कूलों की स्वायत्ता की मांग को सही ठहराया था, यह स्कूल दाखिले के दिशानिर्देश तैयार करने और प्रवेश लेने के कार्य को आगे बढ़ाने में लगे हैं। इस बात से असंतुष्ट कि स्कूलों पर उसकी पकड़ ढीली पड़ रही है शिक्षा निदेशालय चाहता है कि पिछले वर्ष जो कानून थे वह ही लागू रहें।

पाण्डे कहते हैंः ‘‘उच्च न्यायालय ने स्वयत्ता की हमारी मांग को जाएज ठहराया है लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि हमें कुछ गलत करने का लाईसेंस मिल गया है। हमको अच्छी तरह पता है कि हमारी जिम्मेवारी बढ़ गई है। दिशा निर्देश तैयार करने के पीछे हमारा उद्देश्य था कि हम उनको सरकार को सौंपे ताकि वह चेक रखे कि उनका पालन हो रहा है कि नहीं। सरकार का चैक और बैलेंस बनाए रखना का हक उससे नहीं लिया गया है।’’

आर एन आई समय समय पर चेताता रहा है कि शिक्षा निदेशालय जो निजी स्कूलों को अपने अधीन रखने को आतुर है दोषियों के खिलाफ कार्यवाई करने में पीछे नजर आता है। मीडिया और अभिभावकों की ओर से कई शिकायतें सामने लाई गईं परन्तु कोई कार्यवाई नहीं हुई ,जिसके कारण ऐसे स्कूल कानून तोड़ने में अधिक साहिसक हो गये। पिछले वर्ष  शिक्षा निदेशालय के दिशा निर्देश जारी रहने के बावजूद शिकायतें आईं कि कुछ स्कूलों ने एडमिशन के लिए पैसों की मांग की। जिस समय न्यायालय में इस मामले को सुना जा रहा था कुछ स्कूलों ने  रोक के बावजूद नर्सरी में दाखिले लिए और कक्षाएं प्रारंभ कर दीं। अभी तक दोषी स्कूलों के खिलाफ कार्यवाई नहीं हुई। कानून तोड़ने वालों पर कार्यवाई करने के स्थान पर ऐसा प्रतीत होता है कि शिक्षा निदेशालय चाहता है कि वह स्कूलों की स्वायत्ता छीन ले या उन पर नकेल डाल दे।

पाण्डे भी इससे सहमत हैंः ‘‘यदि आप सारी स्वायत्ता छीन लें फिर भी जिन्हें उससे बाहर निकलकर दूसरे रास्ते पर चलना है वे रास्ता ढूंढ ही लेंगे। जो स्कूल कानून से बाहर निकल कर काम करना चाहते हैं उन्होंने पिछले वर्ष भी ऐसा किया। हम केवल स्वायत्ता चाहते हैं। सबके लिए फेयरप्ले सुनिश्चित करने की सरकार की जिम्मेदारी सरकार के साथ बरकरार है। अपने स्वयं के बनाए दाखिले के मानदंडों में यदि हम कुछ भी गलत करते हैं तो मैं उसकी जांच के लिए हर समय तैयार हूं।’’

आर एन आई न्यूज ब्यूरो/अजीज हैदर

image_pdfimage_print

About admin