“स्वतंत्र भारत के इतिहास में सबसे बड़े धोकों में से एक”

NAJMA-BIGयह ऐसा मुद्दा है जो न केवल संसद बल्कि समूचे देश को हिला देने की क्षमता रखता है।यह वर्षों से सुलग रहा है और यदि आग नहीं पकड़ पाया तो केवल इसलिए क्योंकि न ही कांग्रेस न भाजपा चाहती है कि यह तूल पकड़े। लेकिन कुछ लोगों ने ठानी है कि इस मुद्दे पर इंसाफ प्राप्त कर के रहेंगे।यह हैं मशहूर अधिवक्ता प्रशांत भूषण, मौलाना अबुल कलाम आजाद के दत्तक पुत्र के पुत्र और लेखक फीरोज बख्त अहमद और पूर्व में आई सी सी आर से संबंधित रहे मधूप मोहता। इनका मानना है कि समय आ गया है कि इंसाफ हो और ‘‘स्वतंत्र भारत के इतिहास में सबसे बड़े धोकों में एक जिसका कवर-अप किया गया’’ के अपंराधियों को अदालत में खींच लाया जाए।

मोहता का मानना है कि ‘‘इस मुद्दे का कवर-अप और सुभाष चंद्र बोस और लाल बहादुर शास्त्री की मौत के कारणों का कवर-अप वह गंभीर मुद्दे हैं जो दर्शाते हैं कि कैसे कुछ चुनिंदा व्यक्ति भारतीय संघ को और एक के बाद एक सरकारें जनता को बेवकूफ बनाने की साजिश करते रहे। किसी समय आईसीसीआर से जुड़े रहे मधूप मोहता ने सबसे पहले उजागर किया था कि भाजपा की ओर से पूर्व उपराष्ट्रपति की उम्मीदवार और वर्तमान एनडीए सरकार में अल्पसंख्यक मामलों की मंत्री नजमा हेपतुल्ला ने अपनी पुस्तक में मौलाना अबुल कलाम आजाद के साथ अपनी निकटता और संबंध दिखाने के लिए दो फोटो को जोड़कर एक फोटो बनाने का गुनाह किया था जिसको आईसीसीआर ने प्रकाशित किया था। तस्वीर को मौर्फ करने का मामला जब मीडिया में उछला और उस पर एफआईआर,  जनहित याचिका और सीबीआई जांच हुई तो मोहता को ही दोषियों में से एक मानते हुए कार्यवाही हुई और नजमा हेप्तुल्ला किसी भी कार्यवाही से बची रह गईं।

‘‘कानून के लंबे हाथ अभी तक उन तक नहीं पहुंचे क्यों कि वह विभिन्न सत्तासीन सरकारों से अच्छे संबंध बनाए रहीं,’’ फीरोज बख्त अहमद कहते हैं। उन्हें अफसोस है कि हालांकि वह मौलाना आजाद से निकटतम संबंध रखते हैं,  इसके बावजूद नजमा अपने आपको मौलाना आजाद के एकमात्र जीवित रिश्तेदार के रूप में प्रस्तुत करती रहीं। फीरोज बख्त तो यहां तक कहते हैं कि  ’’नजमा का मौलाना आजाद से दूर दूर तक कोई रिश्ता नहीं है।’’

मोहता बताते हैंः ‘‘मौलाना आजाद का कोई वंशज नहीं था। वह अपने बड़े भाई के पुत्र नूरूद्दीन को अपने पुत्र के समान चाहते थे। नूरूद्दीन जिस युवती से विवाह करना चाहते थे वह आयु में उनसे बहुत छोटी थी। नूरूद्दीन ने विवाह का न्योता भेजा तो युवती ने यही कहते हुए मना कर दिया। नूरूद्दीन ने युवती की मां को पत्र लिखा कि वह उनके जैसे प्रतिष्ठित परिवार से आए रिश्ते को ठुकरा रही हैं। युवती की मां ने अपनी बड़ी पुत्री को नूरूद्दीन से विवाह करने को तैयार किया। फीरोज बख्त अहमद का जन्म इसी विवाह के फलस्वरूप हुआ। परन्तु विवाह के बावजूद नूरूद्दीन ने ठीक तरीके से अपने परिवार को नहीं पहचनवाया।’’

The issue was raised earlier but despite court case, FIR and CBI inquiry, died down with time

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मोहता आरोप लगाते हैं कि धीरे धीरे नजमा हेपतुल्ला ने अपने आप को मौलाना आजाद की एकमात्र जीवित संबंधी के रूप में प्रस्तुत करना आरंभ कर दिया। वह दावा करते हैं कि इंदिरा गांधी के नेतृत्व में तत्कालीन कांग्रेस सरकार की भी इस धोके को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका रही। मौलाना आजाद की आत्मकथा के अंतिम 30 पन्नों को 1988 तक गुप्त रखा गया था। इंदिरा गांधी आशंकित थीं कि इन पृष्ठों में जवाहरलाल नेहरू और भारत की आजादी में उनकी भूमिका को आम धारणा से अलग ढंग से चित्रित किया गया हो सकता है। इसलिए, मोहता कहते हैं,  यह मिथक कि नजमा मौलाना आजाद की एकमात्र जीवित रिश्तेदार हैं के निमार्ण के पीछे निहित कारण थे।

नजमा को मौलाना आजाद की एकमात्र जीवित रिश्तेदार के रूप में प्रस्तुत करने के कारण अंततः अभियोजक ने मौलाना आजाद की आत्मकथा के अंतिम 30 पृष्ठों को नजमा के हवाले कर दिया, जिसको नजमा ने प्रकाशित किया। इन प्रकाशित पृष्ठों में हमने जो कुछ पढ़ा वह जनता की उस धारणा के विपरीत था जो उन 30 पृष्ठों के साथ बरती गई गोपनीयता और इस कारणवश मिले प्रोमोशन के कारण उसने बना रखी थी। इन 30 पृष्ठों में कुछ भी ऐसा नहीं मिला जो उनको इतने वर्ष गुप्त रखने का कारण हो सकता है।

मोहता कहते हैं कि जब सोनिया गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस को नजमा के मौलाना आजाद के साथ बनाए गए इस जाली रिश्ते का पता चला तो उसने नजमा को फिर से राज्यसभा में मनोनीत न करने का फैसला लिया। नजमा ने भाजपा का रूख किया जिसने न केवल उनका स्वागत किया बल्कि एक समय डाक्टर कर्ण सिंह को राष्ट्रपति और नजमा को उपराष्ट्रपति बनाने का भी मन बना लिया था। यही वह समय था जब आईसीसीआर ने नजमा की वह पुस्तक प्रकाशित की जिसमें उन के मौलाना आजाद से करीबी रिश्तों का बखान किया गया था। आरोप है कि इस पुस्तक में नजमा और मौलाना आजाद की एक मौर्फ की गई फोटो थी

मोहता कहते हैं कि जांच पर जब पता चला कि फोटो मौर्फ हो सकती है तो उन्होंने उस पुस्तक के मुद्रक को तलब किया जिसने नजमा के कहने पर दो फोटो को मौर्फ कर के एक फोटो बनाने की बात को कबूल किया। पुस्तक को आईसीसीआर ने वापस ले लिया और उस फोटो को बदल कर पुनः प्रकाशित किया। फीरोज बख्त का कहना है कि आज भी पुस्तक का वह पहला संस्करण उनके पास उप्लब्ध है जिसमें मौर्फ फोटो का प्रयोग किया गया था।

फीरोज बख्त बताते हैंः मौलाना आजाद की शाह ईरान के साथ एक फोटो थी जिसमें दोनों सोफे पर विराजमान थे। एक अन्य फोटो में नजमा हेपतुल्ला कुछ अन्य लोगों के साथ सोफे पर बैठी थीं। शाह ईरान को फोटो से हटाकर उसकी जगह नजमा की फोटो लगाई गई ताकि मौलाना आजाद के साथ नजमा को सोफे पर बैठा दिखाया जा सके।

कुछ लोग फोटो मौर्फ करने की इस घटना को, यदि यह सही है,  भले ही छोटा मानें परन्तु फीरोज बख्त ने अदालत में एक याचिका डाली है जिसमें सुनवाई के लिए अगले माह की तारीख मिली है। प्रख्तात अधिवक्ता प्रशांत भूषण फीरोज बख्त की ओर से अदालत में पेश होंगे। फीरोज बख्त का दावा है कि वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को तमाम हालात से अवगत करा चुके हैं। भूषण सीबीआई का एक विशेष जांच दल गठित किए जाने की मांग कर रहे हैं। फीरोज बख्त का मानना है कि उनका केस मजबूत है और कहते हैं कि यदि ‘प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी नजमा को बचाना चाहें तो नहीं बचा सकते।’ वह कहते है,  ‘‘जब सीबीआई जांच शुरू करेगी तो पिछले 60 वर्षों में किया गया कवर-अप खुलकर सामने आएगा।’’

असली मुद्दा, मोहता बताते हैं, यह है कि समूचा तंत्र भारत सरकार को बेवकूफ बनाता रहा है और कई बार उच्च स्थानों पर बैठे लोग देश को बेवकूफ बनाते रहे हैं। मामला आदरणीय अदालत में है जो आने वाले समय में अपना फैसला सुनाएगी। भूषण के इस केस में पड़ने से लगता है कि अधिकारी यदि चाहें भी तो उनके लिए केस को एक बार फिर दबा देना आसान नहीं होगा।

रियल न्यूज इंटरनेश्नल (आरएनआई), नई दिल्ली




मध्य पूर्व में दाएश जैसे संगठनों के दुष्कर्म को सुन्नी शिया लड़ाई के रूप में प्रस्तुत करना इस्रायली साजिश का भागः ईरानी राजदूत

IraniAmbassadorAddressingThePressMeet-1आर एन आई, नई दिल्लीः

इस्रायल मध्य पूर्व देशों को कमजोर करने और वहां की जनता को विभाजित करने में बड़े दिनों से लगा रहा है। बड़े समय से उसकी कोशिश रही है कि इस क्षेत्र के मुसलमानों के बीच सांप्रदायिक तनाव पैदा कर और उसे बढ़ावा देकर उनकी शक्ति को कमजोर कर दे। हाल के दिनों में दाएश जैसी उग्रवादी संगठनों की इराक में लड़ाई और उसके विरूद्ध ईराकी जनता की संयुक्त कारवाई को भी यह शक्तियां सुन्नी शिया लड़ाई के रूप में प्रस्तुत करने में लगी हैं। भारत में ईरानी राजदूत गुलाम रजा अंसारी ने पत्रकारों से एक विशेष बातचीत में आज इन विचारों को रखा। ईरानी दूतावास में मिशन के उपप्रमुख हसन शुजा भी इस मौके पर मौजूद थे।

दाएश और आईएसआईएल जैसी संगठनों की खुले शब्दों में आलोचना करते हुए अंसारी ने क्हा कि इनका मानवता से कोई नाता नहीं है। इस लड़ाई को सुन्नी शिया लड़ाई के रूप में प्रस्तुत करके यह संगठन ईराक में कदम जमाना चाहती है। उन्होंने क्हा कि सीरिया में हुए चुनाव की सफलता के बाद, जिसमें वहां की जनता ने बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेकर बशर अल-असद के प्रति अपने समर्थन को साबित किया दाएश और वहां लड़ रही दूसरी आतंकवादी संगठनों पर बेहद दबाव था। सीरिया में भी उन्होंने इस लड़ाई को साम्प्रदायिक रंग देने की कोशिश की परन्तु सफल नहीं हुए और वहां की जनता ने उनकी सहायता करने के स्थान सीरियाई फौज की सहायता करना अपने पक्ष में बेहतर समझा, जिसके परिणामस्वरूप उन्हें सीरिया में वह सफलता नहीं मिल सकी जिसका वे स्वपन देख रहे थे। अन्तः उन्होंने ईराक का रूख किया और सद्दाम हुसैन की बाथ पार्टी के कुछ सदस्यों के साथ मिलकर ईराक के कुछ हिस्सों पर कब्जा जमा लिया। जब यह पूछा गया कि इतनी बड़ी संख्या में अस्लहों से लैस लोग ईराक में कैसे आ गए और वहां किसी को पता भी नहीं लगा, अंसारी ने माना कि कुछ अन्य क्षेत्रीय देशों की सहायता के बिना यह संभव नहीं हो सकता।

सीरिया में हुए सफल चुनाव की चर्चा करते हुए ईरानी राजदूत ने क्हा कि अमरीका और अन्य पश्चिमी देश सीरिया में जारी संघर्ष को सुन्नी शिया लड़ाई के रूप में पेश कर रहे थे परन्तु 60 प्रतिशत से अधिक जनता ने बशार अल-असद की हिमायत में वोट देकर उनके प्रचार को गलत साबित कर दिया। उन्होंने क्हा कि ईरान शुरू से कहता आया है कि सीरिया की समस्या का केवल राजनीतिक समाधान ही निकल सकता है। अमरीका को भी अब महसूस हो रहा है कि सीरिया के खिलाफ लड़ रहे लोगों को जो सहायता वे प्रदान कर रहे थे वह घूम फिर कर अंततः दाएश और उस जैसी अन्य संगठनों को पहुंची जिसका परिणाम आज सब के सामने है। उन्होंने बताया कि हाल में हुए एक सर्वेक्षण के अनुसार सीरिया के पुननिर्माण और फिर उसे उस मकाम तक पहुंचाने जहां वह आज से तीन साल पूर्व था के लिए करीब दो सौ डालर की आवश्यकता होगी। इससे साफ हो जाता है कि अमरीका और उसके सहयोगियों ने सीरिया में आतंकवादियों को सहायता पहुंचा कर सीरिया को उसकी तीन वर्ष पहले की स्थिति से पचास वर्ष पीछे ढकेल दिया।IraniAmbassadorAddressingThePressMeet-2

अंसारी ने क्हा कि यही कारण है कि ईरान का हमेशा यह रूख रहा है कि जो भी बातचीत की जाए वह उस देश की सरकार से की जाए। लीबिया के सम्बंध में बोलते हुए उन्होंने क्हा कि ईरान लीबिया में सैन्य कारवाई के खिलाफ था। आज लीबिया की बदहाली की खबर लेने वाला कोई नहीं है, उन्होंने क्हा। इसी प्रकार मिस्र को भी अपने पैरों पर खड़ा होने में बड़ा समय लगेगा।

ईराक को ईरान द्वारा सैन्य सहायता देने के प्रश्न पर अंसारी ने क्हा कि ईरान का पहले दिन से रूख रहा है कि यदि ईराकी सरकार हमसे किसी प्रकार की सहायता मांगती है तो सहायता देने के लिए तैयार हैं। परन्तु ईराक के सुन्नी और शिया उलेमा के फतवों के बाद ईराक के ही कई लाख युवा सेना को स्वैच्छिक समर्थन देने के लिए तैयार हैं। इस लिए हमें नहीं लगता कि ईराक में किसी बाहरी देश को हस्तक्षेप करने की आवश्यकता है। उन्होंने क्हा कि हम अमरीका या किसी अन्य देश के ईराक के अन्द्रूनी मामलात में हस्तक्षेप किए जाने के समर्थन में नहीं हैं।

सउदी अरब के बारे में पूछे गए एक प्रश्न का उत्तर देते हुए ईरानी राजदूत ने क्हा कि सउदी अरब क्षेत्र के प्रमुख देशों में से है। हम चाहते हैं कि ईरान और सउदी अरब के सम्बंध बेहतर हों। हमारे बेहतर सम्बंध समूचे मध्य पूर्व में सकारात्मक असर डालेंगे, उन्होंने क्हा।

आर एन आई न्यूज ब्यूरो




ईरान के लिए भारतीय दोस्ती का बदला देने का समय

आर एन आई, नई दिल्लीःindiairan

ईरान की राजनीति में उदारवादी आयतुल्लाह हसन रूहानी की जीत और इसके फलस्वरूप विश्व के छह शक्तिशाली देशों के साथ ईरान की सकारात्मक बातचीत के बाद ऐसा प्रतीत होने लगा है कि ईरान का खराब समय अब गुजर चुका है जिसके परिणामस्वरूप उसपर लगे प्रतिबंध अब आहिस्ता आहिस्ता हटा लिए जाएंगे। ईरान से संबंधित नवीन हालात की रौशनी में उसके लिए प्रमुख नीतिगत चुनौती पश्चिम और उसके अपने पड़ौसियों के साथ संबंधों को प्रगाढ़ बनाना और अपने अकेलेपन से बाहर निकलना है। पर ईरान के लिए इससे भी बड़ी नीतिगत चुनौती भारत जैसे देशों के साथ संबंधों को आगे बढ़ाना है जो प्रतिबंधों की अवधि के दौरान उसके संग खड़े रहे।

ईरान पर लगे प्रतिबंधों के दौरान जब वह सारी दुनिया से अलग थलग पड़ा हुआ था उसे भारत का समर्थन पहले की तरह मिलता रहा जिसके फलस्वरूप ईरान से खरीदे जाने वाले तेल का बड़ा प्रतिशत बेरोकटोक भारत पहुंचता रहा। ऐसे समय में जब प्रतिबंधों के चलते डालर में तेल की कीमत अदा कर पाना असंभव था, भारत ने एक विशेष पहल करते हुए यूनियन बैंक आफ इंडिया में खाता खोलकर रूप्ये में तेल की कीमत अदा करना प्रारंभ किया जो आज तक जारी है। ईरान के खिलाफ विश्व की बड़ी ताकतों की ओर से लगाए गए प्रतिबंधों के बावजूद भारत की ओर से चावल और अन्य आवश्यक वस्तुओं जैसे दवाईयों का व्यापार जारी रहा जो संयुक्त राज्य अमरीका, इसराइल और जीसीसी देश जिन में प्रमुख क्षेत्रीय शक्ति सऊदी अरब भी शामिल है, की झुंझलाहट का कारण बनी।

कड़वी सच्चाई यह है कि अधिकांश मुस्लिम देशों ने परेशानी के समय ईरान को अकेला छोड़ दिया। इस का प्रमुख कारण जीसीसी देशों के साथ वह अनेक मतभेद थे जो समय के साथ अधिक जटिल और विवादास्पद बनते गए। इसका समाधान, यदि कोई है, तो वह तभी निकल सकता है जब ईरान अपनी क्षेत्रीय विदेश नीति में बड़े परिवर्तन करे, जो निकट भविष्य में होता दिखाई नहीं दे रहा। परमाणु विवाद, जीसीसी देशों में शिया आबादी के साथ ईरान के सम्बंध की समस्या, संयुक्त अरब अमारात के साथ तीन द्वीपों अबू मूसा, ग्रेटर तंब और लैसर तंब का मुद्दा और क्षेत्र में बड़े राजनीतिक और रणनीतिक उद्देश्यों के चलते बड़े पैमाने पर राजनीतिक और कूटनीतिक प्रयासों और जीसीसी देशों के संग विश्वास पैदा करने की आवश्यकता है।

हाल ही में भारत ने ईरान के साथ सद्भावना का संकेत देते हुए प्रतिष्ठित अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन पेट्रोटेक 2014 में इसराइल को बाहर रखा है जो जनवरी के महिने में होने जा रही है।

कूटनीटिक मामलों के जानकारों का मानना है कि अब समय है कि ईरान भारत के रूख और उसके द्वारा दिए गए समर्थन का बदला चुकाए जो विपरीत परिस्थितियों के बावजूद उसके साथ खड़ा रहा। हालांकि यह लोग बहुत आशावादी नहीं है कि ऐसा होगा क्योंकि यदि ईरान का पुराना इतिहास देखें तो अच्छे समय में उसने यूरोपीय कंपनियों को आकर्षक ड्रिलिंग से संबंधित एवं अन्य ठेके दिए और उन देशों को नजरअंदाज कर दिया जो प्रतिकूल समय में उसके साथ खड़े रहे।

अतीत में भारत की कोशिश रही है कि शीत युद्ध की अवधि के दौरान जो देश गुटनिरपेक्ष रहे उनका समर्थन करे। दिलचस्प बात यह है कि ईरान अब गुटनिरपेक्ष देशों के संघ की अध्यक्षता कर रहा है। जैसे प्रतिबंध कम होते हैं और बुनियादी ढांचे और तेल से संबंधित टेंडर खुलते हैं तो यह ईरान के ट्रैक रिकार्ड के खिलाफ एक साहसी कदम होगा यदि भारत अब भी उसके व्यापारिक भागीदारों की प्राथमिकी में अपना स्थान रखता है।

रियल न्यूज इंटरनेश्नल न्यूज ब्यूरो




सीरिया में अमेरिकी सैनिक हस्तक्षेप परमाणु तबाही को भड़का सकता है

syria
राष्ट्रसंघ महासचिव श्री बांकीमून ने अनेक विश्व शांति संगठनों के इस चिंता पर सहमति जताई है कि अगर अमेरिका सीरिया में सैनिक हस्तक्षेप करता है तो यह विश्व शांति के लिए बहुत बड़ा खतरा है। नेशनल पैंथर्स पार्टी (ब्लैक पैंथर्स नहीं) ने भी राष्ट्रसंघ महासचिव से मांग की कि वे राष्ट्रसंघ चार्टर की भावना और शांति की रक्षा के लिए हस्तक्षेप करें, जो किसी भी राष्ट्रसंघ सदस्य देश के घरेलू मामलों में दखलअंदाजी की इजाजत नहीं देता। अनुच्छेद-2(7) के आदेश राष्ट्रसंघ महासभा के सभी सदस्यों के लिए अनिवार्य है और इसी तरह समान रूप से बड़ी ताकतों और सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों के लिए भी लागू होते हैं। यह बहुत बड़ी त्रासदी और दुर्भाग्यपूर्ण है कि संयुक्त राज्य अमेरिका जानबूझकर राष्ट्रसंघ चार्टर के आदेशों की अवहेलना कर रहा है, चाहे वह पूर्व यूगोस्लाविया में हो, ईराक, लीबिया, पाकिस्तान अथवा सीरिया में हो। राष्ट्रसंघ चार्टर के उल्लंघन का एक जीवंत उदाहरण है अमेरिका का ईराक पर हमला, जब बुश प्रशासन ने एक झूठे बहाने से ईराक पर हमला किया कि उसने जनसंहार के हथियार छिपा रखे हैं अथवा उनका उत्पादन करता है। यह लेखक संयुक्त राष्ट्र द्वारा ईराक में 2001 में नियुक्त चीफ इंस्पेक्टर से व्यक्तिगत रूप से मिले थे और उनसे बातचीत की थी और जिन्होंने यह स्वीकार किया था कि वे ईराक में ऐसा कोई हथियार नहीं खोज पाये। इस बात में जरा भी संदेह नहीं है कि राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन के खिलाफ अमेरिका के आरोप झूठे, बेबुनियाद थे जो कि राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन को नीचा दिखाने और समाप्त करने के लिए थे। अमेरिका अपनी साजिश में कामयाब हो गया। ईराक के विरुद्ध एंग्लो-अमेरिकन हमले पर राष्ट्रसंघ की खामोशी ने राष्ट्रसंघ की साख पर तो बट्टा लगाया ही साथ ही उसके लिए यह एक आत्मघाती कदम था।

1999 में अमेरिका ने नाटो का इस्तेमाल करके यूगोस्लाविया पर खुल्लमखुल्ला हमला कर दिया और उसकी नीयत यही थी कि वह यूगोस्लाविया की सर्बियन संस्कृति, इतिहास और सभ्यता को नष्ट कर दे। नाटो ने हजारों लोगों का जनसंहार कर दिया, जबकि विश्व समुदाय को ये उभरते रुख रास नहीं आ रहे थे कि यूगोस्लाविया का नाम ही राष्ट्रसंघ की सदस्यता से मिटा दिया जाय। राष्ट्रपति स्लोबोदान मिलोसेविच को बेलग्रेड के उनके निवास से उठा लिया गया और अमेरिकी कमांडों की देखरेख में हेग, नीदरलैंड की अंधेरी जेल में डाल दिया। आखिरकार उन्हें कारागार में मरा पाया गया, जब अभियोजक उन पर कोई भी आरोप साबित करने में विफल हो गये। जब लेखक ने श्री रामसे क्लार्क के साथ राष्ट्रपति स्लोबोदान मिलोसेविच से हेग की कारागार में मुलाकात की तो उन्होंने दोनों से गुजारिश की कि हम उनका मुकदमा लड़ें। कानून के शासन की, जैसा मैंने देखा, हत्या कर दी गयी, जबकि तथाकथित अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय ने राष्ट्रपति स्लोबोदान मिलोसेविच की हम दोनों को पैरवी करने से मना कर दिया और कहा, ‘‘यह न्यायालय का अधिकार है कि निर्णय करे कि कौन अटोरनी विचाराधीन कैदी की पैरवी करे।‘‘ इसी अधिकार का व्हाइट हाऊस ने उपदेश दिया जब वे विश्व न्यायालय में अपने राजनीतिक विरोधियों से निपटते थे। यह आदेश प्रेजिडेंट बुश के तथाकथित वल्र्ड आर्डर के तहत उस समय भी लागू किया गया, जब राष्ट्रसंघ चार्टर की अवहेलना करके ईराक पर हमला किया और साथ ही साथ सारे अन्तर्राष्ट्रीय कानूनों की भी धज्जियां उड़ा दी।

बीस लाख से अधिक लोग भूख और अकाल से मर गये जब अमेरिका ने ईराक के विरुद्ध गैरकानूनी और तानाशाही आर्थिक प्रतिबंध लगा दिये थे। इस लेखक ने अपनी पुस्तक ‘ईराक-ए हीरोइक रेजिसटेंस‘ में विस्तार से बताया कि किस तरह एंग्लो-अमेरिकन धड़े ने ईराक के लोगों पर हमला किया और मासूम लोगों का जनसंहार किया। अमेरिका का ईराक में मिशन यही था कि वह उसके तेल, जमीन और रणनीतिक पानी पर कब्जा कर ले और यही सारी अरब दुनिया में करना चाहते थे। अमेरिका को सद्दाम हुसैन अपने इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए सबसे बड़े बाधक नजर आ रहे थे और इसीलिए उन्होंने विश्व मीडिया अभियान चलाकर उनको नीचा दिखाया और आखिरकार सद्दाम हुसैन की हत्या करने में सफल हो गये। इस ‘न्यायिक फांसी‘ को सारी दुनिया ने देखा। अमेरिका ने दावा किया कि वह ईराक में लोकतंत्र लाना चाहता था। किस तरह का लोकतंत्र अमेरिका ईराक में ला पाया है, जिसे दुनिया का कोई भी आदमी देख सकता है कि सैंकड़ों मासूम रोजाना मारे गये और वो भी पश्चिमी दुनिया से उत्पादित किये गये हथियारों से। लेकिन ईराक में ऐसे कोई जनसंहार के हथियार नहीं मिले?

राष्ट्रसंघ को अपनी उस खामोशी का जवाब देना होगा, जब नाटो लड़ाकू विमान लीबिया के लोगों पर बम बरसा रहे थे। अन्तर्राष्ट्रीय कानून और राष्ट्रसंघ चार्टर को एंग्लो-अमेरिकन धड़े ने मिलकर हवा में उड़ा दिया और यूरोपीय देशों के साथ लीबिया पर नृशंस हमला कर दिया। कैसे और किस प्रावधान के अन्तर्गत एंग्लो-अमेरिकन धड़े ने नाटो ताकतों का अरब लोगों को नष्ट करने में इस्तेमाल किया? यहां तक कि लीबियाई नेता कर्नल गद्दाफी को बड़ी बेरहमी से मार दिया। एंग्लो-अमेरिकन धड़े का उद्देश्य लीबिया में न तो लोकतंत्र स्थापित करने का था और न कोई कानून व्यवस्था लागू करने का था, बल्कि लीबिया के तेल भंडारों पर कब्जा करना चाहता था, जो दुनिया के तेल भंडारों में नवें स्थान पर आता है। क्या हुआ आखिर लीबिया में, कहां है लोकतंत्र? अमेरिका ने लीबियाई नेता के शव को गायब कर दिया। वे कहां गायब हो गये? कौन इंसानियत, अमन और इंसाफ की बात कर सकता है, जबकि अमेरिका ईराक, लीबिया और सीरिया में जनसंहार पर आमादा है।

Dr. Bhim Singh, Chief Patron, National Panthers Party

Dr. Bhim Singh, Chief Patron, National Panthers Party

अमेरिकी साजिश का अगला निशाना भारत है। अमेरिका 1951 से विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र को अस्थिर बनाने के लिए डिक्सन प्लान को बढ़ावा देता आ रहा है। उन्होंने कई विकल्प भारत पहुंचने के निकाले। भारत तक पहुंचने के लिए दो बड़े दुश्मन थे, सीरिया और ईरान। इसीलिए अमेरिका और जियोवादियों ने अन्तर्राष्ट्रीय मीडिया का इस्तेमाल करते हुए सीरिया के राष्ट्रपति को नीचा दिखाने की कोशिश की। डा. बशर-अल-असद ही अरब नेताओं के आखिरी वंशज बचे हैं, अमेरिका मिस्र में भी अरब नेतृत्व को समाप्त करने में कामयाब हो गया। राष्ट्रपति हुस्नी मुबारक को उखाड़ फेंका और 85 साल की उम्र में कैद कर लिया। पहली बार निर्वाचित राष्ट्रपति मोहम्मद मोरसी को भी एक साल का शासन पूरा नहीं करने दिया गया, क्योंकि एंग्लो-अमेरिकन धड़ा उनका उपयोग वैसा नहीं कर पाया, जैसा चाहता था। ऐसा ही पाकिस्तान में हुआ जब अमेरिका को पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने 1999 में उनके आदेशों का पालन नहीं किया। अमेरिका अब कोई और नासिर या सद्दाम या गद्दाफी यहां तक कि कोई यासिर अराफात अरब भूमि पर नहीं देखना चाहता। उनकी सारी रणनीति यही है कि अरब दुनिया में कोई नेतृत्व न उभरने दिया जाय, जिससे अमेरिका अपने एक वल्र्ड आर्डर से सारी दुनिया पर शासन कर सके। अमेरिका की सारी दिलचस्पी अरब तेल, भू-सम्पदा और रणनीतिक भूमि पर कब्जा करने में है। एंग्लो-अमेरिकन धडे़ को गिलगित-बल्तिस्तान चाहिए कि वह चीन पर अपनी गिद्ध दृष्टि बनाये रखे। इस धड़े को अफगानिस्तान इसलिए चाहिए कि वह रूस पर निगाह रख सके। अमेरिका लेटिन अमेरिका को इसलिए नियंत्रण में लेना चाहता है कि तमाम सोने और हीरे के भंडार और बोलिविया की खनिज सम्पदा उनके हाथ में आ जाय और सारे लेटिन अमेरिकी देशों पर अमेरिका का राज हो। अमेरिका की इसमें कोई दिलचस्पी नहीं है कि अरब दुनिया अथवा अफ्रीका अथवा और कहीं लोकतंत्र स्थापित किया जाय, बल्कि वह तो सारी अरब दुनिया, अफ्रीका और लेटिन अमेरिका के तेल, भूमि और पानी पर कब्जा करना चाहता है।

पश्चिमी धड़े ने मुस्लिम-ईसाई टकराव को उभारकर सूडान का विभाजन करा दिया, जैसे कि तीस के दशक में ब्रिटिश राज ने भारतीय उपमहाद्वीप में किया था। उन्होंने कैमरून, कांगो, पूर्वी अफ्रीका का भी विभाजन करा दिया। 1947 में उन्होंने फिलस्तीन के टुकड़े इसलिए कर दिये कि उन्हें एक जियोवादी राज्य इजरायल स्थापित करना था। ये सब अरब दुनिया के लिए पश्चिम का बड़ा विश्वासघात था। प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान 1917 में ब्रिटिश सरकार ने  बेलफोर समझौते पर मक्का के शरीफ के साथ हस्ताक्षर किये, यह वादा करते हुए कि अरब अगर प्रथम विश्वयुद्ध में ब्रिटेन का साथ देंगे तो फिलस्तीन को आजादी दे दी जाएगी। 1947 में ब्रिटेन ने अरबों को धोखा दिया और फिलस्तीन का मामला राष्ट्रसंघ के नियंत्रण में दे दिया, जिससे कि फिलस्तीन का विभाजन करके इजरायल को बनाया जा सके। राष्ट्रसंघ के प्रस्ताव 181 के द्वारा फिलस्तीन का विभाजन कराके ब्रिटेन ने राष्ट्रसंघ के साथ मिलकर एक अनजाने देश इजरायल को अरब दुनिया के मध्य में स्थापित कर दिया। इससे स्पष्ट संकेत था कि एंग्लो-अमेरिकन धड़ा अरब देशों के मध्य में अपना एक देश स्थापित करके मध्य-पूर्व में अपने एजेंडा और उद्देश्यों को पूरा कर सके।

1967 में इजरायल ने अपने पड़ोसी अरब देशों मिस्र, जोर्डन, सीरिया और फिलस्तीन पर हमला करके अरब भूमि के एक बहुत बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया, जो एक अन्तर्राष्ट्रीय साजिश थी और राष्ट्रसंघ चार्टर का खुल्लमखुल्ला उल्लंघन था। सुरक्षा परिषद ने अनेक प्रस्ताव 242, 338 और अन्य पारित करके इजरायली हमले की निंदा की और इजरायल को निर्देश दिया कि वह सारी अरब भूमि खाली कर दे। इजरायल ने न सिर्फ राष्ट्रसंघ प्रस्तावों की अवहेलना की, लेकिन राष्ट्रसंघ चार्टर का उल्लंघन जारी रखा। राष्ट्रसंघ के पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं है कि वह फिलस्तीन और अरब भूमि पर इजरायल ने राष्ट्रसंघ प्रस्तावों का उल्लंघन करके जो हमला किया उस पर वह खामोश कैसे रहा। यरूशलम मस्जिद अल-अक्सा और सीरिया की गोलान पहाडि़यों पर कब्जा इजरायल द्वारा राष्ट्रसंघ प्रस्तावों के अवहेलना के नये उदाहरण हैं। सीरिया के स्व. राष्ट्रपति हाफिज-अल-असद द्वारा की गयी ‘लैंड फार पीस‘ की पेशकश की उपेक्षा की गयी। जियोवादी देश इजरायल को जोर जबर्दस्ती से गोलान पहाडि़यों पर अपना देश स्थापित करने की इजाजत दी। उस वक्त एंग्लो-अमेरिकन धड़े के नेता कहां थे? अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय क्यों खामोश रहा? विश्व शांति मिशन के नेता उस वक्त कहां थे? दूसरी तरफ पश्चिमी दुनिया ने ईराक पर सारे प्रस्ताव कार्यान्वित करते हुए ईराक पर हमला कर दिया। आखिरकार एंग्लो-अमेरिकन धड़ा विश्व की एक महान सभ्यता को नष्ट करने में कामयाब को गया और ईराक के नेताओं को दुनिया की आंखों के सामने मरवा दिया।

फिलस्तीनी राष्ट्रपति यासिर अराफात को एंग्लो-अमेरिकन धड़े ने धोखा दिया, जबकि अराफात इजरायली नेताओं से हाथ मिलाने के लिए व्हाइट हाऊस तक गये, ओसलो समझौते पर अमेरिकी राष्ट्रपति की उपस्थिति में हस्ताक्षर किये। फिलस्तीन देश का क्या हुआ? कोई क्लिंटन या ओबामा पश्चिमी नेताओं के अरबों के साथ किसी और धोखे के बारे में बता सकता है? दूसरी तरफ पश्चिमी देश इजरायल को फिलस्तीन में यहूदी बस्तियां बसाने को बढ़ावा दे रहे हैं, जबकि राष्ट्रसंघ के प्रस्तावों के आदेशों के यह बिल्कुल विपरीत है।

ओबामा प्रशासन की नीयत सिर्फ यही है कि सीरिया पर हमला करके राष्ट्रपति डा. बशर-अल-असद को खत्म कर दे, जैसा कि उसने ईराक, लीबिया, कांगो और अन्यत्र किया, जिससे ‘सर्वशक्तिमान‘ संयुक्त राज्य अमेरिका के खिलाफ उठने वाली कहीं कोई आवाज न रहे। इस तथ्य की पुष्टि नाटो राजनीतिक चीफ श्री एंडर्स फोब राजमुसैन के इस स्पष्ट संदेश से हो जाती है कि सीरिया पर हमला ‘छोटा, तेज और संक्षिप्त‘ होगा। इसका मतलब क्या है? इसका मतलब है कि यह हमला सीरियाई नेतृत्व को और निश्चित रूप से सीरिया के निर्वाचित राष्ट्रपति डा. बशर-अल-असद को मिटाना होगा।

ब्रिटिश संसद ने एक चतुर रणनीति रखी है कि अरबों की राय को विभाजित रखा जाय। प्रधानमंत्री डेविड कैमरून अपना यह प्रस्ताव 13 वोटों से लोकसभा में हार गये। ब्रिटिश संसद ने अपना स्पष्ट संदेश यह दिया कि ब्रिटेनवासियों ने ईराक और लीबिया से काफी सबक सीख लिया है। सारा यूरोप और यूरोपीय समुदाय जानता है कि ब्रिटेन सहित किसी को भी एंग्लो-अमेरिकन धड़े की ईराक, यूगोस्लाविया अथवा लीबिया में जीत का एक छदाम भी नहीं मिला। फ्रांस शायद यूरोप का अकेला ऐसा देश है जो अमेरिका के सीरिया पर हमले के इस आखिरी कारनामे में शामिल होने को उतावला है और इसका कारण यही है कि फ्रांस ने संयुक्त सीरिया पर अपना उपनिवेशिक नियंत्रण खो दिया था। सीरिया छोड़ते हुए फ्रांस ने उसमें से लेबनान को सीरिया से अलग कर दिया। फ्रांस अभी तक यह नहीं भूला है कि कैसे ब्रिटेन और फ्रांस को मिस्रियों ने स्वेज नहर से बाहर खदेड़ा था, तब फ्रांस और ब्रिटेन के उपनिवेशिक हित साझे थे।

ऐसा लगता है कि अगर ऐसा ही चलता रहा तो संयुक्त राष्ट्र का भी वही हश्र होगा, जो लीग आफ नेशन्स का हुआ था। रूस और चीन के नेतृत्व का एंग्लो-अमेकिरन धड़े द्वारा कोई शोषण नहीं किया जा सकता, क्योंकि प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान दुनिया के अलग गठबंधन और समीकरण थे। सोवियत संघ की समाप्ति के बाद यह तथाकथित शीतयुद्ध समाप्त हो जाता, लेकिन रशियन फेडरेशन ने अपने नए नेतृत्व से मध्य-पूर्व में स्थिति की असलियत को देखते हुए सच्चाई को समझ लिया। रूस सुदूर व्हाइट हाऊस से अपने दरवाजे पर हथियारों का जखीरा देखना सहन नहीं कर सकता। पुतिन ने अपनी इच्छाशक्ति और साहस का परिचय दिया, जब सीरिया में तथाकथित रासायनिक अस्त्रों को खत्म करने की बात को उसने बकवास बताया। इस रक्षा गेमप्लान में रूस अकेला नहीं है, चीन भी बराबर का साझीदार है, वे समझते हैं कि अमेरिका द्वारा सीरिया को खत्म करके वे इजरायल को खुला हाथ देना चाहते हैं, जिससे वह मध्य-पूर्व में अपनी प्रादेशिक योजनाओं को फैला सके। ओबामा की सीरिया पर हमला करने की मजबूरी हो सकती है, क्योंकि उस पर जियोवादी लाबी का जबर्दस्त प्रभाव है। तथाकथित प्रस्ताव जो अरब लीग देशों के नेताओं ने काहिरा में अपनाए कि सीरिया पर हमले से कोई नतीजा नहीं निकलेगा। ओबामा अपने ही तर्कों में परास्त हो गये, जब एक तरफ वे अरब नेताओं के सहयोग का स्वागत करते हैं और दूसरी तरफ अरब दुनिया में लोकतंत्र लाने की बात करते हैं। क्या ओबामा ईराक, सीरिया और अन्य अरब देशों में दखअंदाजी को तर्कसंगत बता सकते हैं?

भारत ने जी20 सम्मेलन की पूर्वसंध्या पर अपना रूख साफ कर दिया कि भारत कभी भी सीरिया के घरेलू मामलों में दखलअंदाजी को समर्थन नहीं देगा और यही भारत के लोग भी चाहते हैं। भारत के लोग सारी दुनिया में शांति चाहते हैं, सार्वभौमिकता और सभी देशों की स्वाधीनता चाहता है। वे किसी भी देश के घरेलू मामलों में हस्तक्षेप का विरोध करते हैं, चाहे वह कितना बड़ा देश हो, चाहे कितना छोटा भी। अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा को इतिहास के उन भविष्य के लेखों को समझ लेना चाहिए। उन्हें दुनिया के शांतिप्रेमी लोगों की उम्मीदों पर खरा उतरना होगा। दुनिया के लोग उनमें गांधी और मार्टिन लूथर किंग की भावना देखना चाहते हैं, न कि हिटलर अथवा बुश की। बुद्धिमता साहस में नीहित है। क्या ओबामा यह साहस दिखा सकेंगे कि विश्व शांति और मानव गौरव को बनाये रख सकें?

भीमसिंह
(मुख्य संरक्षक, नेशनल पैंथर्स पार्टी)




क्या भारत अपना निहित स्वार्थ पूरा करते विदेशियों का जंगी मैदान बनता जा रहा है?

Funeral prayers of the young man killed in indiscriminate firing

रियल न्यूज इंटरनेश्नल (आर एन आई), लखनऊः

गत कुछ महिनों में देश के कई बुद्धिजीवि जो शक जता रहे थे वह खुल कर सामने आ गया।  अब और अधिक साफ होता जा रहा है कि भारत क्षेत्रीय प्रभुत्व और निहित स्वार्थों की पूर्ती करने की चाह रखने वाली विदेशी ताक़तों के लिए जंगी मैदान बनता जा रहा है। इसका बड़ा कारण कमज़ोर और बिना सोचे समझे बनाई गई विदेशी नीति है जो केवल और केवल भारत के अन्दर और बाहर हो रही गतिविधियों पर प्रतिक्रिया देने तक सीमित है। अदूरदर्शी विदेश नीति के स्थान पर ऐसी रणनीति की आवश्यकता है जो भारत के लघु और दीर्घकालिक हितों की पूर्ती कर सके। उदाहरण के रूप में चीन को पेश किया जा सकता है जो हाल के वर्षों में क्षेत्रीय प्रभुत्व और अपने व्यापारिक हितों की सुरक्षा के संदर्भ में हम से बहुत आगे निकल गया है।

गत दिनों में बुद्धिजीवियों के मन में अपने निहित स्वार्थ की पूर्ती के लिए विदेशी फंडिंग को लेकर जो शक पैदा हुए थे वह विभिन्न संदिग्ध गतिविधियों पर आधारित थे। तमाम शक अंततः सही साबित हुए जब एक वहाबी संगठन सुन्नी मजलिसे अमल ने विदेशी धन एवं वित्तीय और अन्य सहायता को लेकर भानुमति का पिटारा जैसे खोल दिया। हाल ही में लखनऊ में मुसलमानों के एक वर्ग पर हुए हमले और उसके बाद की दंगा जैसी स्थिति पर विचार व्यक्त करते हुए संगठन ने दावा किया है कि इसके पीछे ईरान और पाकिस्तान से समर्थन पा रहे कुछ उलेमा का हाथ है। एक संवाददाता सम्मेलन में बोलते हुए सुन्नी मजलिसे अमल के मौलाना अब्दुल वली फारूकी ने मजलिस से बाहर आ रहे मुसलमानों के एक वर्ग पर हुई अंधाधुंध फायरिंग को ईरानी और पाकिस्तानी समर्थित कुछ उलमा से जोड़ने की कोशिश की। समाजवादी पार्टी को उसके पिछले चुनावी घोषणापत्र की याद दिलाते हुए जिसमें जेलों में बंद बेगुनाह मुसलमानों की रिहाई की बात की गई थी, यह संस्था अंधाधुंध फायरिंग में पकड़े गए लोगों को छुड़ाने की नाजाएज कोशिश कर रही है। इस आतंकवादी हमले में दो व्यक्तियों की मौत हो गई थी और बीस से अधिक लोग जख़मी हुए थे। वहाबी संस्थाओं के दौलत और वोट के दबाव के चलते ही उत्तर प्रदेश सरकार ने अंधाधुंध फायरिंग की घटना को आतंकवादी कार्यवाही करार देने से परहेज किया था।

सुन्नी संगठन के आरोपों पर तुरन्त प्रतिक्रिया देते हुए बेगम हजरत महल यूथ ब्रिगेड ने क्हा है कि सऊदी अरब और तालिबानी सोच से जुड़े उलमा की गतिविधियों की जांच करने की आवश्यकता है। बेगम हजरत महल यूथ ब्रिगेड द्वारा आयोजित एक समारोह की अध्यक्षता करते हुए शहजाद अब्बास ने जो संयोग से सपा से जुड़े युवा नेता हैं क्हा है कि सुन्नी मजलिसे अमल अंधाधुंध फायरिंग की वारदात को आतंकवादी घटना करार देने की बात से गुस्सा है। वे अपने रसूख का प्रयोग करते हुए सरकार पर दबाव बनाना चाह रहे हैं कि वह फायरिंग की वारदात अंजाम देने के इल्ज़ाम में पकड़े गए लोगों को छोड़ दे। ‘‘हर कोई जानता है कि दुनिया भर में आतंकवाद का प्रचार कौन कर रहा है,’’ अब्बास ने क्हा और आगे क्हा कि सऊदी और तालिबानी समर्थन पाने वाले यह लोग लखनऊ में मुसलमानों के दरमियान दूरी बनाने की भरपूर कोशिश कर रहे हैं। इस प्रकार के लोग समाजवादी पार्टी को भी बदनाम कर रहे हैं, उन्होंने क्हा और इनकी गतिविधियों पर तुरन्त रोक लगाने की मांग की।

शहज़ाद हक़ीक़त से दूर नहीं हैं! आरोप और काउंटर आरोप इस बात के सूचक हैं कि गुप्त विदेशी सहायता के कारण लखनऊ में आतंकवादी हमला तक हो चुका है, इन हमलों के असली कारण अभी भी सामने आना बाक़ी हैं। हालांकि कई दूरदर्शी लोग पहले से ही ऐसे हालात की चेतावनी दे रहे थे, हकीकत यह है कि सरकार एक बार फिर समय रहते कोई कार्यवाही करने में विफल रही है। पिछले दिनों अली कांग्रेस के अध्यक्ष डाक्टर अमानत नकवी ने लखनऊ शहर में विदेशियों की आवाजाही और यहां के मुसलमानों से उनके रिश्तों पर आवाज़ उठाई थी परन्तु किसी के कानों पर जूं तक न रेंगी।

इनके असली इरादे का पता चलता है जब हम देखते हैं कि लखनऊ में गत छह महिने के दौरान अमरीका, इस्रायल और ब्रिटेन के हाई कमिश्नर/राजदूत पधारे हैं। इन देशों से संबंधित कई वरिष्ठ राजनयिकों ने भी कई मौकों पर लखनऊ का दौरा किया। अधिक गंभीर विषय यह है कि इनकी बैठकें सरकार के प्रतिनिधियों से कम और वहाबी झुकाव के लिए जाने वाले मुस्लिम नेताओं से अधिक हुईं। प्रश्न यह उठता है कि क्या इन दूतावास/उच्च आयोग के वरिष्ठ कर्मचारियों ने नदवे आदि का दौरा केवल इस लिए किया कि वे यहां की सुंदर इमारत को देखना चाहते थे या रात्री भोग में शामिल होना चाहते थे। रात के खाने में शहर के नामवर मुसलमानों को आमंत्रित करने पर ज़ोर था। कई मुस्लिम उलमा और नेताओं ने होटल के कमरों में इनसे गुपचुप मुलाक़ातें कीं। इमामे हरम की देवबंद और नदवे की यात्राओं ने स्थिति को और अधिक खराब कर दिया। जानकारों को पता है कि इमामे हरम धार्मिक पद नहीं बल्कि राजनीतिक नियुक्ति होती है। पहले से लिखे भाषण के अतिरिक्त इमामे हरम अपनी ओर से कोई भी नहीं कह सकते। गत 50 वर्षों में इन इमामे हरम को भारत आने की नहीं सूझी परन्तु बदलते सियासी हालत के तहत एक ही वर्ष में कई इमामे हरम भारत पधारे। उनके दौरे के समय भी यह बातें सामने आईं कि सैकड़ों करोड़ रूपये लखनऊ लाए गए हैं परन्तु फिर भी सरकार ने कोई प्रतिकिया नहीं की। कई सौ रूपये कुछ शैक्षिक संस्थानों की स्थापना हेतु दिए गए। क्यों??? अमरीका, इस्रायल और ब्रिटेन को अचानक मुसलमानों के उसी फिरक़े से इतनी मौहब्बत क्यों हो गई जिसको 9/11 का दोषी करार दिया गया था, जो  अपनी आतंकवादी गतिविधियों के लिए कई देशों में जाना जाता है और जिसकी पकड़ धकड़ में इन देशों ने अफगानिस्तान और ईराक को तहस नहस कर दिया था।

प्रश्न उठता है कि यह सब अब क्यों? इसका उत्तर पाने के लिए हम को विश्व के उभरते परिदृश्य पर नज़र करना होगी। अमरीका और उसके सहयोगियों ने इराक और अफगानिस्तान जैसे सुन्नी शासित देशों पर पहले ही विजय प्राप्त कर ली है। सऊदी अरब, बहरीन और कुवेत जैसे देशों के सम्राट अपने स्वयं के हितों की पूर्ती के कारण अमरीका आदि के साथ अपने को गठबंधित कर लिया है। अब समय है ईरान (अधिकतर शिया) और सहयोगियों जैसे सीरिया और लेबनान को लक्षित करने का। जो अनजान हैं उनकी जानकारी के लिए शिया ईरान सहित मध्य पूर्वी देशों में 40 प्रतिशत से अधिक हैं। ईरान में इस्लामी क्रांति के बाद से और फिलिस्तीन, बोस्निया समेत दूसरे मुस्लिम मामलात में अधिकतर सुन्नी भी ईरान का समर्थन करते हैं। विश्व भर में सुन्नी-शिया संघर्ष को बढ़ावा देकर अमरीका और उसके सहयोगी ईरान को सुन्नियों से मिलने वाले नैतिक समर्थन को कम करना चाहते हैं। सऊदी अरब से जुड़े वहाबी मुसलमानों को इस्तेमाल किया जा रहा है जो भारतीय भूमि पर सुन्नी-शिया प्रतिद्वंद्विता उत्तेजित करने हेतु आतंकवाद जैसी वारदात की हद तक चले गए। भोले और अशिक्षित मुसलमान दोनो पक्षों के कुछ उलमा की रणनीति का शिकार हो जाते हैं जिनको हर प्रकार का लाभ हो रहा है। भारत सरकार ने इस खतरे पर अंकुश लगाने के लिए अब तक कुछ नहीं किया जो धीरे धीरे समूचे भारत में पैर पसार रहा है।

रियल न्यूज़ इंटरनेश्नल न्यूज़ ब्यूरो




शिवपाल यादव इस्रायल की यात्रा पर रवाना

मुस्लिम  संस्थाओं का समाजवादी पार्टी से अमरीका और इस्रायल से बढ़ती दोस्ती पर अपना रूख साफ करने की अपील

आर एन आई, लख्नऊः

अमरीका, इस्रायल और ब्रिटेन ने भारत की अंदरूनी सियासत में दख्लअंदाजी करने के लिए नई रणनीति निर्धारित की है। ये नई रणनीति अपनी मांगे और कार्यसूचि मंवाने के लिए केन्द्र में सत्तारूढ़ पार्टी की ओर देखने की जगह स्थानीय पार्टियों से दोस्ती बढ़ा कर केन्द्र में सत्तारूढ़ पार्टी पर दबाव बना कर अपने एजेंडे की पूर्ती कराना है। लख्नऊ की सियासत अभी ब्रिटेन और अमरीका के भारत में राजदूतों के आगमन से उबर भी नहीं पाई थी कि आज समाजवादी पार्टी के मुख्य नेता और मुलायम सिंह यादव के भ्राता शिवपाल यादव की इस्रायल की रवांगी की खबर ने न केवल राजनैतिक और सामाजिक हल्कों में बदलते संबंधों को लेकर चर्चा का बाजार गरम कर दिया बल्कि एक तब्के में मुख्यतः मुसलमानों में बेचैनी को और अधिक बढ़ा दिया।

आर एन आई को मिली जानकारी के अनुसार शिवपाल यादव बुनदेलखंड में सिंचाई व्यवस्था को बेहतर बनाने के लक्ष्य की पूर्ती के लिए जानकारी प्राप्त करने इस्रायल की यात्रा पर गए हैं। अभी एक ही रोज पहले ब्रिटेन के राजदूत लख्नऊ आकर मुस्लिम नेता खालिद रशीद फिरंगीमहली से मुलाकात कर चुके हैं जिसके पश्चात वह एम बी कलब में अम्मार रिजवी द्वारा दिए गए रात्री भोज में भी उपस्थित हुए। चार दिन पूर्व अमरीका के भारत में राजदूत ने भी लख्नऊ का रूख किया था और मुख्य मंत्री अखिलेश यादव से मुलाकात की थी। उनके आगमन पर भी अम्मार रिजवी ने एम बी कलब में रात्री भोज का आयोजन किया था जिसमें लख्नऊ के राजनैतिक, सामाजिक और शैक्षिक जगत के करीब 150 व्यक्तियों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। मौलाना खालिद रशीद फिरंगीमहली इस भोज में भी आमंत्रित थे। करीब दो माह पूर्व बिल गेट्स भी लख्नऊ आकर अखिलेश यादव से मुलाकात कर आगे वाली मुलाकातों के लिए जमीन समतल कर चुके हैं।

मुसलमानों के मध्य इन बदलते समीकरणों को लेकर बेचैनी है। प्रदेश में मुसलमान समाजवादी पार्टी के साथ बड़े लंबे समय से जुड़ा रहा है और इस पार्टी के साथ अपनी सुरक्षा और दूसरे हितों को जोड़ कर देखता है। परन्तु ब्रिटेन, अमरीका और इस्रायल का एजेंडा मुसलमानों के खिलाफ होने के कारण उत्तर प्रदेश के मुसलमान समझ नहीं पा रहे कि अमरीका और इस्रायल से बदलती दोस्ती के पीछे क्या राज है।

आर एन आई से बातचीत करते हुए असर फाउंडेशन के अध्यक्ष शौकत भारती ने अमरीका और इस्रायल से समाजवादी पार्टी की बढ़ती नजदीकी पर गहन चिंता जताई। उन्होंने क्हा कि मुसलमानों ने समाजवादी पार्टी का साथ उसकी पालिसी के तहत दिया था न कि किसी व्यक्ति विशेष से प्रेम के कारण। यदि समाजवादी पार्टी ने अमरीका और इस्रायल के एजेंडे के साथ चलने की चेष्टा की तो मुसलमान उससे अपने को अलग कर लेंगे। उन्होंने क्हा कि यह विदेशी ताकतें अपने ‘डिवाईड एंड रूल’ अर्थात बांटो और राज करो के फार्मूले पर चलते हुए देश की जनता को बांटने का काम कर रही हैं जो कि भारत के खिलाफ साजिश है।

हालांकि सब लोग अमरीका, ब्रिटेन आदि की स्थानीय पार्टियों से बढ़ती नजदीकियों को इस दृष्टिकोण से नहीं देख रहे। अपना नाम न बताने की शर्त पर लख्नऊ के एक सामाजिक कार्यकत्र्ता ने बताया कि इस का असली कारण भारत में एफ डी आई और रिटेल की अनुमति प्राप्त करना है और इसकी आड़ में यह विदेशी ताकतें अपने अन्य स्वार्थ की पूर्ती भी कर सकती हैं जो इस समय ईरान और सीरिया की सरकारों को गिराना है।

यहां यह उल्लेख करना आवश्यक है कि पिछले दिनों मे अमरीका ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से  भी अपनी मित्रता बढ़ाई है जिस के फलस्वरूप आज पश्चिमी बंगाल में कई अमरीकी कंपनियों ने अपने कारोबारी ठिकाने बना लिए हैं। हिलेरी क्लिंटन भारत में आईं तो पहले कल्कत्ते का रूख करके उन्होंने केन्द्रीय सरकार को पैगाम दे दिया कि वह उनका विरोध करके या उनके एजेंडे के विपरीत जाकर चैन से न बैठे। शायद उत्तर प्रदेश के माध्यम से भी यही पैगाम देना उद्देश्य है।

इन लोगों का मानना है कि उत्तर प्रदेश सरकार का इतना महत्वपूर्ण सदस्य केवल कोई छोटी सी जानकारी प्राप्त करने इस्रायल का रूख करे, यह बात अकल से परे है। समझा जा रहा है कि इसके पीछे बहुत ही महत्वपूर्ण उद्देश्य छिपे हैं। आर एन आई से सम्पर्क में कुछ संस्थाओं का कहना है कि वह शीघ्र ही इस मुद्दों को लेकर जनता के मध्य जाएंगी और समाजवादी पार्टी के लीडरों से मांग करेंगी कि वह अपना रूख साफ करे। आखिर क्यों शिवपाल यादव ने इस्रायल की यात्रा पर जाने से पहले जनता और खासकर अपने मुस्लिम वोटबैंक के जजबात की ओर ध्यान नहीं दिया?

आर एन आई न्यूज नेटवर्क




इमाम-ए-हरम के दौरों का राज!

रईस खान/आर एन आई

इमाम अरबी का शब्द है। इसके माएने मुसलमानों का नेतृत्व करना होता है और मस्जिदों में या सामूहिक नमाज पढ़ने वाले को इस शब्द से बुलाया जाता है। उसे पेश इमाम भी कहा जाता है। इस्लामी फिक्ह के हिसाब से सुन्नी मुसलमानों में इमाम अबू हनीफा, इमाम मालिक, इमाम शाफई और इमाम अहमद इब्न हंबल, चार इमामों को मान्यता हासिल है।

इसी तरह अकीदे के तहत इमाम इब्न हंबल, इमाम अल अशअरी, इमाम अबू मंसूर अल मातुर्दी और इमाम वसील इब्ने अता का नाम इतिहास में दर्ज है। हदीस के विशेषज्ञों में इमाम बुखारी, इमाम अबू दाउद, इमाम मुस्लिम, इमाम फख्र राजी का नाम आता है।

जबकि अधिकतर शिया मुसलमान 12 इमामों को मानते हैं। और यह माना जाता है कि ये खुदा की तरफ से इंसानी खिदमत और मार्गदर्शन के लिए चुने गए। वे हजरत अली, हजरत हसन इब्ने अली, हजरत हुसैन इब्न अली समेत हजरत मुहम्मद इब्ने अल हसन तक 12 इमाम की श्रृंखला पर विश्वास रखते हैं।

मुसलमानों के अकीदे के तहत खलीफा को इमाम का पर्याय माना जाता है। और खलीफा या इमाम पैगम्बरे इस्लाम हजरत मोहम्मद(स.) के उत्तराअधिकारी बने। उनको प्रशासनिक, सियासी और मजहबी अधिकार हासिल होते थे।

मक्का स्थित मस्जित-अल हराम में इस वक्त जो इमाम हैं वह पेशइमाम की हैसियत रखते हैं। इस समय वहां 9 इमाम और 16 मोअज्जिन नियुक्त है। रमजान के महीने में 6 मोअज्जिन बढ़ाए जाते है। इनमें प्रमुख इमाम शेख डा0 अब्दुल रहमान अल सुदेस है। उसके बाद शेख डा0 अल सऊद अल शुरेम का नाम डिप्टी चीफ इमाम के तौर पर आता है। शेख अब्दुल्लाह अवद अल जुहानी 2007 से हरम शरीफ में इमामत के लिए मुंतखब है। शेख डा0 मोहर अल मुएक्ली, शेख डा0 खालिद अल गामदी, शेख डा0 सकीय बिन अब्दुल्लाह अल हुमैद, शेख डा0 उसामा बिन अब्दुल्लाह अल खय्यात, शेख डा0 सालेह अल तालिब, शेख फैसल अल गजावी हरम शरीफ के इमाम है, ये सभी इमाम क्रमवार इमामत करते है।

इन्ही इमामों मे से  इमाम-ए-हरम अलसुदेस पिछले साल मार्च में दिल्ली आए थे और उन्होंने दिल्ली की जामा मस्जिद और दिल्ली के रामलीला मैदान पर मुसलमानों को नमाज पढ़ाई थी। उन्हे भारतीय संसद के भी दर्शन कराए गए थे और प्रधानपंत्री के साथ उन्होंने बैठक भी की थी। गौरतलब है कि इमाम अल सुदेस के दौरे के समय जमीयतुल उलेमा हिंद के अरशद मदनी खासतौर से उनकी मेजबानी कर रहे थे। इसी साल अप्रैल में दूसरे इमाम अल शुरैम भी मौलाना अरशद मदनी की दावत पर देवबंद और दिल्ली के दौरे पर थे। जबकि लखनऊ के दौरे पर आए इमामे हरम डा. खालिद अल गामदी को नदवा से जुड़े और बीयूएमएस कॉलेज चला रहे मौलाना सलमान नदवी ने आमंत्रित किया था।

इमामे हरम का मामला चूंकि सऊदी अरब की सरकार से जुड़ा होता है, इसलिए उनका दौरा भी बहुत जटिल होता है। भारत सरकार और सऊदी सरकार की अनुमति के बाद ही दौरे का कार्यक्रम तय होता है। सऊदी सरकार जिन कार्यक्रमों में शामिल होने के लिए इमामे हरम को अनुमति देती है वह सिर्फ उन्ही कार्यक्रमों में हिस्सा ले सकते हैं। और यही कारण रहा कि कानपुर के ग्रीन पार्क में उनके लिए बनाए गए कार्यक्रम में वह शिरकत नहीं कर सके और यदि वह चाहते भी तो लखनऊ के शिया नेता कल्बे जव्वाद की दावत पर शिया समुदाय की इमामत करने नहीं आ सकते थे।

हैरत की बात तो यह है कि देश भर से मुसलमान भाग-भाग कर इमामे हरम के पीछे नमाज अदा कर रहे थे, वहीं उलेमा तबका टस से मस नहीं हुआ। देवबंद के उलेमा लखनऊ नहीं पहुंचे। अरशद मदनी साहब न तो लखनऊ आए और न ही इससे पहले इमाम हरम के दौरों में नदवा के किसी बड़े आलिम के उनसे मिलने की खबर है। यहां तक कि पिछली बार के इमामे हरम के दौरे में सरकार के प्रतिनिधि की हैसियत से के रहमान उनकी आवभगत में थे। तब वह राज्यसभा में डिप्टी स्पीकर थे, लेकिन अब यूपीए चेयर पर्सन सोनिया गांधी के नुमाइंदे की हैसियत से वह लखनऊ इमामे हरम डा खालिद अल गामदी से मुलाकात करने पहुंचे और वह भी सोनिया गांधी के द्वारा इमामे हरम को लिखे गए इस्तकबालिया खत के साथ।

मुसलमानों के मसाएल और हालात पर गहरी नजर रखने वालों का मानना है कि देश के उलेमा जगत की जानी मानी हस्तियां कहने के लिए देश भर के मुसलमानों से एक प्लेटफार्म पर आने की उम्मीद रखती हैं, लेकिन खुद इस पर अमल नहीं करना चाहती हैं। हाल ही में मुंबई में आल इंडिया पर्सनल ला बोर्ड के सम्मेलन के दौरान सभी फिरके के उलेमा एक मंच पर जमा होकर शरीयत में छेड़छाड़ के खिलाफ जान की बाजी लगाने की कसमे खा रहे थे, लेकिन इमामे हरम के दौरे से सिर्फ अपने मसलक, अपने सियासी ताल्लुकात और अपने आर्थिक हालात मजबूत करते दिखाई दिये।

समाजी हल्कों में माना जा रहा है कि इमामे हरम के दौरे भारत में अलग-अलग प्लेटफार्म पर आयोजित करने की वजह सरकार के सामने और सियासी तौर पर अपने आपको ताकतवर साबित करना और अपना मफाद हासिल करना है। इसीलिए कभी देवबंद से जुड़े उलेमा उन्हे दावत दे रहे हैं और कभी नदवा के उलेमा। और भारत के इतिहास में यह पहली बार हुआ है जब तीन अलग-अलग इमामे हरम ने एक साल के अंदर दौरा किया। पाकिस्तान, बांगलादेश और दूसरे तमाम मुस्लिम मुल्कों में इस तरह इमामे हरम के दौरे की कोई खबर नहीं है। आखिर क्या है भारत में ही लगातार इमामे हरम के दौरों का राज?

प्रेक्षकों का मानना है कि कहीं न कहीं इन इमाम हजरात के दौरों का ताल्लुक सऊदी और भारत सरकार के कुछ पेचीदा मामलों से है। सऊदी अरब को सब लोग जानते हैं कि वह बरसों से अमेरिका का पिट्ठू बना हुआ है। अमेरिका की दुनिया के मुसलमानों के खिलाफ हर कार्रवाई में सऊदी सरकार उसको सहयोग करती आ रही है। चाहे इराक का मामला हो या अफगानिस्तान और लीबिया का। सऊदी  सरकार ने कभी विरोध नहीं जताया। बल्कि वहां की पाक मुकद्दस धरती पर 1991 से ही अमेरिका और ब्रिटेन की फौजों ने डेरा डाल रखा है और सऊदी सरकार बकायदा उनके खर्च की भरपाई करती आ रही है। पिछले कुछ सालों से जिस तरह ईरान आर्थिक और तकनीकी तौर पर मजबूत हो रहा है वह न तो अमेरिका को फूटी आंख सुहा रहा रहा है और न ही सऊदी सरकार को। और अमेरिका लगातार ईरान को घेरने की कोशिश करता आ रहा है। और इसमे सऊदी अरब का उसे पूरा सहयोग मिल रहा है। लेकिन भारत सरकार अमेरिका की ईरान दुश्मनी में उसके साथ जाने को राजी नहीं है। और यही कारण है कि अमेरिका कूटनीति चालों का इस्तेमाल करते हुए सऊदी अरब से भारत सरकार को प्रभावित करना चाह रहा है। लोगों का मानना है कि अप्रत्यक्ष रूप से सऊदी सरकार के प्रतिनिधि के तौर पर इमामे हरम का दौरा प्रायोजित किया जा रहा है। क्योकि भारतीय मुस्लिम ईरान के मामले में हर हाल में अमेरिका का विरोध भी कर रहे है।

गौरतलब है कि लखनऊ दौरे में इमामे हरम डा खालिद अल गामिदी ने उन्नाव के बंथरा में एफ वाई अबुल हसन अली मिया नदवी के  नाम से एक अस्पताल का उद्घाटन किया। उन्होंने मलिहाबाद में भी एक संस्थान का उद्घाटन किया और इंटेगरल विश्वविद्यालय के मेडिकल साइंसेस इंस्टीट्यूट की संगे बुनियाद रखी। जानकारों की राय के मुताबिक नदवा समेत इन संस्थानों को सऊदी अरब सरकार समेत वहां का फंड मिलता है इसलिए आयोजकों ने जमकर जलसों और समारोहों का आयोजन किया। शिक्षा कारोबार से जुड़े इन आयोजकों को सरकार का भरपूर सहयोग तो मिलेगा, लेकिन आम मुसलमानों को क्या फायदा होगा। पूर्व सांसद इलियास आजमी इमामे हरम के दौरे को मुसलमानों में अंधविश्वास बढ़ाने वाला मानते हैं। उनका कहना है ‘‘इमामे हरम होना कोई अजीम शख्सियत नहीं होती। क्योंकि इमामे हरम सऊदी सरकार की ओर से तनख्वाह पर रखे जाते हैं। अहमियत और तवारीख काबा शरीफ और मस्जिदे हरम की है। इसलिए लखनऊ में इमामे हरम के पीछे नमाज पढ़ने से हरम शरीफ का सवाब नहीं मिल जाएगा। भारतीय उलेमा देश में एक गलत परंपरा डाल रहे हैं और मुसलमानों में ब्राह्मण्यवाद को बढ़ावा दिया जा रहा है। इमामत के दौरान खुतबा उनको लिखकर दिया जाता है, मजाल है कि वह अमेरिका के खिलाफ मुसलमानों के समर्थन में एक भी शब्द बोलें।’’

वहीं राष्ट्रीय लोकमंच से जुड़े पूर्व सांसद मौलाना उबैदुल्लाह खान आजमी इमामे हरम के भारतीय दौरों को ‘‘एक बड़ा खेल’’ बताते हैं। लखनऊ में पत्रकार इकबाल अहमद का मानना है कि इमामे हरम के आगे पीछे वही लोग लगे रहे जो अक्सर सियासी ऐतबार से आम मुसलमानों का खून चूसते है।

लेखक हिन्दी समाचार पत्र कौमी फरमान के सम्पादक हैं




ईरान का मीठा तेल, अमरीका के लिए कड़वा सच

उसके कथित रूप से शांतिपूर्ण परमाणु कार्यक्रम पर चिंता के बहाने ईरान पर लगाए गए एकतरफा प्रतिबंधों के जवाब में ईरान ने ब्रिटिश और फ्रांसीसी कंपनियों को तेल निर्यात बन्द कर दिया है। अलर्ट आर0एन0आई0 एक्टिविस्ट जहीर जैदी के माध्यम से मिले इस लेख में हम कमेंटेटर नादिर मोखतारी के विचार प्रस्तुत कर रहे हैं जिनका कहना है कि आर्थिक मंदी के चलते यूरोपीय देश पिछले छह महिने से ईरान से लिए गए तेल की कीमत का भुगतान करने में असमर्थ थे और अब के बजाए जूलाई से प्रतिबन्ध लगा कर वे छह महीने और मुफत में ईरानी तेल प्राप्त करना चाहते थे जिसके बाद वह प्रतिबन्ध का बहाना लगा कर तेल की कीमत अदा करने से बच जाते।

प्रमुख स्तंभकार और कमेंटेटर नादिर मोखतारी ने एक साक्षातकार में विस्तार से इस मुद्दे पर चर्चा की है जिसका प्रतिलेखन यहां दिया जा रहा हैः

प्रश्नः यदि आप बता सकें तो बताएं कि ऐसा क्यों है कि ईरान ने ब्रिटिश और फ्रांसीसी कंपनियों को तेल बिक्री बन्द कर दी जब्कि प्रतिबन्ध जूलाई में लागू होने थे आप का इस बारे में क्या विचार है?

नादिर मोखतारीः बिक्री आदान प्रदान का नाम है। आप माल देते हैं तो बदले में भुगतान मिलता है। हुआ यह कि फ्रांस और अन्य पांच देशों को दिये गए तेल का भुगतान काफी समय से बाकी था। ईरान में कई लोगों को यह पता है कि ईरान के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम को बहाना बनाकर यह यूरोपीय देश जिन्होंने गत छह महीनों से आयात किये गए तेल का भुगतान नहीं किया है छह महीने और मुफत में तेल प्राप्त करना चाहते थे। यदि यूरोप ने पिछले छह महीनों से अपने तेल का भुगतान नहीं किया है और इसे और खींच कर ईरान से एक साल के लिए मुफत तेल प्राप्त करना चाहता है तो अपनी अतीत की साम्राज्यवादी मानसिकता के तहत वह ऐसा सोच सकते हैं पर 21वीं सदी में ऐसा मुमकिन नहीं है।

यह कहना कि ईरान के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के चलते यह प्रतिबन्ध लगाए गए ऐसा सच नहीं है। उन्हें व्यस्क बनते हुए अपने बिलों का भुगतान करना सीखना चाहिए। परन्तु कड़वा सच यह है कि आर्थिक मन्दी के चलते वह अपने बिलों का भुगतान करने की हालत में नहीं हैं यहां तक कि ऋण भी नहीं चुका सकते और इसी कारण से मूडीज़ ने उनकी क्रेडित रेटिंग कम करने का फैसला किया है। इस कारण वह बहाने से तेल प्राप्त करना चाह रहे थे।

परमाणु कार्यक्रम केवल एक बहाना है खरीदी गई वस्तुओं की कीमत अदा करने से बचने का। पहले ईरान के परमाणु हथियार बनाने की बात करते थे। यदि आप ने ध्यान दिया है, पश्चिमी मीडिया खास कर अमरीका का मीडिया अब ईरान पर प्रतिबन्ध का औचित्य साबित करने हेतु परमाणु हथियारों की क्षमता जैसे वाक्यों का उपयोग कर रहे हैं] क्योंकि पहले वाली बात कि ईरान परमाणु हथियारों को बनाने में जुटा है विश्व स्तर पर स्वीकार नहीं की गई। वे इस प्रकार के हजार बहाने बनाएंगे ईरान पर हमले का औचित्य साबित करने के लिए क्योंकि वह जानते हैं कि ईरान ने पिछले 30 सालों में अपने को तकनीकी रूप से समृद्ध बनाया है, यहां तक कि अंतरिक्ष में राकेट और उपग्रह तक भेज दिए।

प्रश्नः ठीक है, यह बताएं कि यह प्रतिबन्ध कैसे नकारात्मक तरीके से ईरान को प्रभावित करेंगे, जैसा कि पश्चिमी देश कह रहे हैं।

नादिर मोखतारीः यूरोप में अस्सी रिफाईनरियों को ईरान का कच्चा तेल प्राप्त होता है जो बहुत हल्का मीठा और सलफर मुक्त तेल होता है। यह देखने में सोने जैसा, बहुत हल्का और बहुत सस्ते में रिफाईन होने वाला तेल है। यह सऊदी कच्चे तेल से विपरीत है जो टार की तरह बहुत गाढ़ा और अधिक सलफर मात्रा वाला तेल होता है। यदि वे सऊदी कच्चा तेल लेते हैं तो उन्हें अपनी रिफाईनरियों में बदलाव लाना पड़ेगा और उन्हें कहीं अधिक खर्चा करना पड़ेगा। अपनी रिफाईनरियों में बदलाव लाने में उन्हें दो महीने लग जाएंगे और सऊदी तेल को सलफर रहित करने पर दोगुना खर्चा आएगा। इस लागत की कीमत यूरोपीय उपभोकताओं को चुकानी होगी।

इस प्रकार ऐसा करना यथार्थवादी नहीं है। दूसरे जिस वित्तीय संकट से यूरोपी देश गुजर रहे हैं उसमें ऐसा करना उनके हित में नहीं है। जहां तक ईरान का सम्बंध है] इसका तेल विश्व में सब से हलका और मीठा है और कई एशियाई और दक्षिण अफ्रीकी देश इसे खरीदने को तैयार हैं। भारत ने इस वर्ष के लिए अपने कोटे में 50 प्रतिशत की वृद्धि की है और चूंकि पश्चिमी देशों ने धन हस्तांतरण से मना कर दिया है, भारत सोने] खाद्य वस्तुओं और रूप्ये की शकल में कीमत देने को तैयार है। भारत, पाकिस्तान और चीन से माल और सेवाओं के अफगानिस्तान के रास्ते से स्थानांतरण करने और ईरान से पाकिस्तान, भारत और चीन के लिए पाईपलाइन द्वारा तेल लाने के लिए भी व्यवस्था बनाई जा रही है। ईरान, अफगानिस्तान और पाकिस्तान के नेता इसी कारणवश कुछ दिन पूर्व पाकिस्तान में एकत्रित हुए थे।

अपने तेल या पेट्रोलियम उत्पादों के लिए ईरान को ग्राहकों की कमी कभी नहीं हो सकती। ईरान को विश्वास है कि यूरोप के विपरीत अन्य ग्राहक हैं जो उससे तेल लेने और तेल के बदले कीमत अदा करने को तैयार हैं। यहां तक कि रूस भी हमारे तेल को अपने दक्षिणी गणराज्यों की आपूर्ती के लिए खरीदने को उत्सुक है। यूरोपीय कहते हैं कि सऊदी अरब किसी भी कमी को पूरा कर देगा। यदि खाड़ी के देशों का प्रवेश द्वार] स्ट्रेट आफ होरमुज, को इज्राईल या अमरीकी/ब्रिटिश हमले की स्थिति में ईरान बन्द कर देता है तो सऊदी] अमीराती] कुवेती और ईराकी तेल का भी निर्यात रूक जाएगा। अमीरात से ओमान जा रही पाईपलाईन स्ट्रेट आफ होरमुज से हो कर रोज जाने वाले 17 लाख बैरल तेल का 6 प्रतिशत ही ले जा सकती हैं। सिर्फ यही नहीं, स्ट्रेट आफ होरमुज से तेल लेकर जा रहे सुपर टैंकर ईरानी पानी में होकर ही गुजर सकते हैं। यदि स्ट्रेट आफ होरमुज तीन से छह महीनों के लिए बन्द कर दी जाती है तो न केवल यूरोपीय संघ बल्कि खाड़ी क्षेत्र, चीनी, जापानी, भारतीय और कोरियाई अर्थव्यवस्था का नाश होगा। डालर और यूरो धूल चाटेगा।

ऐसी नई विश्व व्यवस्था के निमार्ण की आवश्यकता है जिसमें अमरीका ही अकेली महाशक्ति नहीं रहे। दूसरी ओर यूरोपीय संघ जिसके पास कोयले, आलू और उत्तरी सागर में बहत थोड़े से तेल के अतिरिक्त अपना कहने को कुछ नहीं है, दुनिया के बीमार आदमी की तरह कम से कम कुछ और समय के लिए अपने बूढे़ होते हथियारों से विश्व को तबाह करने में जुटा रहेगा। लीबिया इसका जीता जागता उदाहरण है!

इस साक्षातकार पर टिप्पणी करते हुए ज़हीर जैदी कहते हैं कि वह समय दूर नही जब अमरीका की चैधराहट खाक में मिल जाएगी। अमरीका के पास विनाशकारी हथियारों के अतिरिक्त बेचने को कुछ भी नहीं। लगता है अमरीका के दिन पूरे हो गए हैं। ईरान पर हमला अमरीका के लिए वाटरलू साबित हो सकता है। इज्राईल पहले ही हिज्बुल्ला से डर कर भाग चुका है। यदि ईरान और हिज्बुल्ला खुल कर सामने आ गए तो दोनों देशों की खैर नहीं।

आर0एन0आई0 न्यूज़ नेटवर्क




कांग्रेस की केन्द्र सरकार में कुछ मंत्री इस्राईल की गोद में बैठने को बेचैन क्यों

इस्राईल का मध्य पूर्वी देशों पर वर्चस्व इस कद्र बढ़ चुका है कि वह न तो उसके विरोध में बोल पाने और न ही अपनी आवाज़ उठाने की स्थिति में हैं। जो देश विश्व भर में कुरआन बांट कर यह दिखाने की कोशिश में लगे हैं कि वह धर्म के सब से बड़े पालक हैं वह भी इस्राईल के समर्थक बने बैठे हैं और अमरीका के साथ मिलकर इस्राईली एजेंडे को बढ़ावा देने में लगे हैं।

मध्य पूर्व में देखा जाए तो केवल लेबनान सीरिया और ईरान ही बचते हैं जो आज भी फिलिस्तीन के मुद्दे को ज़ोर शोर से उठाए है और अमरीका और इस्राईल की इस इलाके में अपना वर्चस्व बनाने की कोशिश कें रोढ़ा बने खड़े हैं। अन्य देशों ने तो जैसे अमरीका के दबाव में फिलिस्तीन का मुद्दा छोड़ ही दिया है।

अरब देशों ने अपनी कमज़ोरी के कारण अमरीका और इस्राईल के आगे घुटने अवश्य टेक दिए हों पर कोई कारण नहीं बनता कि भारत इन दोनों से डर जाए। भारत एक शक्तिशाली देश है और उसे न तो अमरीका और न इस्राईल पिट्ठू के रूप में इस्तेमाल कर सकता है। यदि अमरीका और इस्राईल को अपने क्षेत्रीय स्वार्थ देखना हैं तो भारत भी केवल अपने स्वार्थ के लिए खड़ा रहे तो क्या आपत्ति है।

जहां भारत ने ईरान से अपने रिश्ते बनाए रखने का निर्णय लेकर विश्व को यह बता दिया है कि हम कुछ शक्तिशाली देशों के क्षेत्रीय स्वार्थ के आगे झुकने वाले नहीं वहीं केन्द्र की कांग्रेस सरकार में कुछ मंत्री ऐसे भी हैं जो इस्राईल की गोद में बैठने के लिए बेचैन दिखाई पड़ रहे हैं।

केन्द्रीय मंत्री एस एम कृष्णा हाल ही में इस्राईल के दौरे पर गए तो उन्होंने इस्राईल की धरती पर खड़े होकर यह ब्यान दे डाला कि उसे संयुक्त राष्ट्र की संस्था IAEA के प्राचल अनुसार परमाणू ऊर्जा कार्यक्रम पर काम करना चाहिए। कृष्णा इस प्रशन का उत्तर दे रहे थे कि भारत ईरान के विष्य पर इस्राईल और अमरीका के साथ क्यों नहीं है। कृष्णा ने इस्राईल और भारत को स्वाभाविक सहयोगी भी बताया और क्हा कि वह इस्राईल के साथ मिलकर आतंकवाद से लड़ने में आपसी सहयोग को बढ़ाएंगे। कृष्णा ने यह नहीं बताया कि इस्राईल ‘स्वाभाविक सहयोगी कैसे है न ही उन्होंने इस्राईल द्वारा सीरिया में विरोधियों को दी जा रही आर्थिक और हथियारों की मदद की बात की। जैसे इस्राईल में कुछ लोगों को पहले जानकारी हो कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद किस निष्कर्ष पर पहुंचने वाली है इस्त्रायली नेता लीबरमैन ने क्हा कि उन्हें विश्वास है कि परिषद द्वारा इस मामले की मंजूरी के पश्चात तमाम देश ईरान से सम्बंध तोड़ देंगे।

ऐसा प्रतीत होता है कि इस्राईल में एस एम कृष्णा को घेरने की कोशिश की गई। भारत लंबे समय से फिलिस्तीन के पक्ष का हिमायती रहा है पर ऐसा प्रतीत होता है कि इस्राईल और अमरीका के दबाव के चलते भारत ने अपना रूख बदल लिया है। एस एम कृष्णा ने इस बात की भी अंदेखी कर दी कि इस्राईल ने भारत के समान न तो NPT पर दस्तखत किये हैं और न ही वह IAEA के इंस्पेक्टरों को दिमोना के पास स्थित निगेव न्यूक्लियर रिसर्च सैन्टर का मुआयना करने की आज्ञा देता है जिस के लिए क्हा जाता है कि वहां से इस्राईल अपना परमाणु शस्त्र बनाने का कार्यक्रम चलाता है। दूसरी तरफ ईरान में IAEA के इंस्पेक्टर अब तक 4000 घंटों से अधिक का मुआयना कर चुके हैं। हाल ही में जर्मनी ने दो परमाणु पंडुप्पी इस्राईल को भेंट की थीं जो केवल दिखाने के लिए तो हो नहीं सकती। कृष्णा को यह तो बताना ही पड़ेगा कि आखिर उनकी कथनी में दोगुलापन क्यों।

दिल्ली में हुए इस्राईली दूतावास की कार बम ब्लास्ट मामले में भी कुछ व्यक्तियों का इस्राईल की ओर झुकाओ दिखाई दिया। अमरीका और इस्राईल ने तुरन्त इसमें ईरान का हाथ होने का ज़ोर शोर से प्रचार किया यह तो समझ में आता है क्योंकि ऐसा कहने में सब से अधिक लाभ उन्हीं को होने जा रहा है। इस्राईल ने तो यहां तक कह दिया कि बैंगकाक और जोरजिया में प्रयोग किया गया बम दिल्ली के बम जैसा था पर यह नहीं क्हा कि इसी प्रकार के बम से तीन ईरानी परमाणू वैज्ञानिकों की हत्या हो चुकी है।

भारत ने आनन फानन में इस्रायली एजेंसी मोसाद को भारत के आंतरिक मामले में जांच की सहमति दे दी यह सोचे बिना कि क्या कोई दूसरा बड़ा देश भारत की सी बी आई या रा को इस प्रकार जांच करने की आज्ञा देता है। यह भी सार्वजनिक करने की आवश्यकता है कि मोसाद चीफ तामीर पारदो की कुछ दिन पूर्व भारत की गुपचुप यात्रा का मकसद क्या था।

ऐसा प्रतीत होता है जैसे कुछ लोगे प्रतीक्षा में बैठे थे कि इस प्रकार की कोई घटना घटे और वह ईरान पर आरोप लगा दें। इस्राईल से दोस्ती निभाने की खातिर यह भारत के हितों की अंदेखी करने भी तुले हैं।




इजरायली दूतावास के सामने हुए ब्लास्ट की मुकम्मल जांच ज़रूरीः भीम सिंह

नेशनल पैंथर्स पार्टी के चेयरमैन एवं राष्ट्रीय एकता परिषद के सदस्य प्रो ़ भीम सिंह ने प्रधानमंत्री डा ़ मनमोहन सिंह से मांग की कि वे नई दिल्ली में इजरायली दूतावास के सामने कल हुए कार-ब्लास्ट की बम विशेषज्ञों से जांच कराएं जिससे कि इस ब्लास्ट के पीछे छिपे सच का सारी दुनिया को पता चल सके।

प्रो ़ भीम सिंह ने क्हा कि तल-अवीव में बैठे इजरायली प्रधानमंत्री ने ईरान के खिलाफ फैसला दे दिया कि यह बम-विस्फोट ईरान ने कराया है क्योंकि यही अमरीका और इजरायल के मुआफिक है। उन्होंने क्हा कि ईरान सरकार ने नई दिल्ली में दिन दहाड़े हुए बम-ब्लास्ट में संलग्न होने से इन्कार किया है जिसे मंजूर किया जाना चाहिए क्योंकि ईरान एक पुरातन सभ्यता का देश है और वह ऐसे छोटे मोटे कारनामे करके अपनी विश्वसनीयता को खोना नहीं चाहेगा।

पैंथर्स अध्यक्ष ने क्हा कि इजरायल की बनायी यह कहानी किसी को भी मंजूर नहीं हो सकती क्योंकि एशिया में सिवाय इजरायल के और कोई ऐसा बम-ब्लास्ट कर ही नहीं सकता।

इस विषय में वरिष्ट पत्रकार कमर आगा का भी मानना है कि मीडिया को किसी निष्कर्ष पर पहुंचने की जगह संयम से काम लेना चाहिए  और भारत सरकार को इस मामले की उच्च स्तरीय जांच कराना चाहिए। ऐसा इसलिए क्योंकि आज तक ईरान से जुड़ी कोई भी संस्था इस प्रकार की आतंकवादी कार्यवाई में लिप्त नहीं पाई गई है। हिज्बुल्लाह का भी कार्यक्षेत्र केवल लेबनान के आसपास ही सीमित रहा है। कमर आगा ने आर0 एन0 आई0 को बताया कि यह इसलिए अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि भारत ईरान के सम्बंध न केवल पुराने हैं बल्कि विश्व के कई बड़े देश इन सम्बंधों को लेकर परेशान हैं। ‘ऐसा न हो कि किसी दूसरे के द्वारा की गई आतंकवादी साज़िश के नतीजे में भारत-ईरान सम्बंध खराब हो जाएं’, उन्होंने क्हा।

कमर आगा ने यह भी क्हा कि विश्व भर में सब से अधिक यदि कोई आतंकवाद का निशाना बना है तो वह शिया समुदाय है। इस के बाद भी आज तक कोई भी शिया आतंकवाद से जुड़ा नहीं पाया गया। ऐसा इसलिए क्योंकि आतंकवाद इस समुदाय की धामिर्क विचारधारा से मेल नहीं खाता।’

इजरायल और अमरीका को ईरान के यदि किसी से सम्बंध खटक रहे हैं तो वह भारत से ईरान के सम्बंध हैं। बम ब्लास्ट होते ही अमरीका और भारत में इजरायली समर्थक लोगों  ने इन सम्बंधों की दुहाई देना प्रारंभ कर दिया जो साफ तौर पर दिखाता है कि इससे सब से अधिक लाभ किसे पहुंचने वाला है।